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ज़ुबैर अहमद सानी

ज़ुबैर अहमद सानी

ग़ज़ल 8

नज़्म 3

 

अशआर 13

मौज़ू'-ए-गुफ़्तुगू तो है जिंसी जमालियात

और मरकज़-ए-ख़याल तुम्हारा ही जिस्म है

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ज़िंदगी से मिला नहीं कुछ भी

फिर भी इक आस है मुसलसल है

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इस वास्ते मुहाल है हम दोनों में निबाह

तू ख़ुद-नुमा है मैं भी रिया के ख़िलाफ़ हूँ

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मैं रफ़्ता रफ़्ता तुझे भूलता ही जाता हूँ

किसी की याद यूँ परवरदिगार आती है

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रोज़ मिलता है बुलंदी का नया ज़ीना मुझे

रोज़ तकलीफ़ कई लोगों को हो जाती है

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