ज़ुबैर फ़ारूक़ के संपूर्ण

ग़ज़ल 6

शेर 5

इतनी सर्दी है कि मैं बाँहों की हरारत माँगूँ

रुत ये मौज़ूँ है कहाँ घर से निकलने के लिए

फिर भी क्यूँ उस से मुलाक़ात होने पाई

मैं जहाँ रहता था वो भी तो वहीं रहता था

है हर्फ़ हर्फ़ ज़ख़्म की सूरत खिला हुआ

फ़ुर्सत मिले तो तुम मिरा दीवान देखना

हर तरफ़ फैला हुआ था बे-यक़ीनी का धुआँ

ख़ुद-बख़ुद 'फ़ारूक़' फिर इक रास्ता बनता गया

एक इक कर के बहुत दुख साथ मेरे हो लिए

मरहला-दर-मरहला इक क़ाफ़िला बनता गया

पुस्तकें 2

Aayat-e-Karb

 

1988

Dr. Zubair Farooq Shakhsiyat Aur Fan

 

2009

 

वीडियो 7

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
At a mushaira

ज़ुबैर फ़ारूक़

Hamari Association Mushaira - Dubai 2012

ज़ुबैर फ़ारूक़

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