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ग़ज़ल
रच गया है मेरी नस नस में मिरी रातों का ज़हर
मेरे सूरज को बुला दे ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी!
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
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विषय
नाज़
नाज़ शायरी
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नज़्म
दूर तक याद-ए-वतन आई थी समझाने को
वक़्त-ए-रुख़्सत उन्हें इतना भी न आए कह कर
गोद में आँसू कभी टपके जो रुख़ से बह कर
राम प्रसाद बिस्मिल
नज़्म
मेरे कमरे में उतर आई ख़मोशी फिर से
हर नए ज़ख़्म ने फिर याद दिलाया मुझ को
इसी कमरे में कभी
मोहसिन नक़वी
नज़्म
दीपावली
निगाहों का मुक़द्दर आ के चमकाती है दीवाली
पहन कर दीप-माला नाज़ फ़रमाती है दीवाली
नज़ीर बनारसी
नज़्म
हज़र करो मिरे तन से
मिरे नज़ार बदन में लहू ही कितना है
चराग़ हो कोई रौशन न कोई जाम भरे













