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बेनियाज़ी पर शेर

बे-नियाज़ या बे-परवाह

होना जैसे आशिक़ के जज़्बात की कोई ख़बर ही न हो माशूक़ की अदाओं में शुमार होता है। यह अदा इतनी जान- लेवा होती है कि आशिक़ के गिले शिकवे कभी ख़त्म होने का नाम नहीं लेते। यही बे-नियाज़ी सन्तों, सूफियों और फक़ीरों में भी होती है जो कभी कभी किसी शायर के जिस्म में भी बिराजमान होते हैं। बे-नियाज़ी शायरी ऐसे तमाम जज़्बों और रवैय्यों को ज़बान देती है। हाज़िर हैं चंद नमूने आपके लिए भी।

ये अदा-ए-बे-नियाज़ी तुझे बेवफ़ा मुबारक

मगर ऐसी बे-रुख़ी क्या कि सलाम तक पहुँचे

शकील बदायूनी

बे-नियाज़ी हद से गुज़री बंदा-परवर कब तलक

हम कहेंगे हाल-ए-दिल और आप फ़रमावेंगे क्या

Interpretation: Rekhta AI

शायर अपने महबूब की बेरुखी से परेशान होकर शिकायत कर रहा है। वह तंज़ (व्यंग्य) करते हुए महबूब को 'बंदा-परवर' (कृपालु) कहता है, लेकिन असलियत में महबूब उसकी बात अनसुनी कर देता है। शायर का दुख यह है कि जब भी वह दिल की बात कहता है, महबूब लापरवाही से पूछता है 'क्या?', जैसे उसे कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता।

मिर्ज़ा ग़ालिब

मुझे अब देखती है ज़िंदगी यूँ बे-नियाज़ाना

कि जैसे पूछती हो कौन हो तुम जुस्तुजू क्या है

अख़्तर सईद ख़ान

आशिक़ों की ख़स्तगी बद-हाली की पर्वा नहीं

सरापा नाज़ तू ने बे-नियाज़ी ख़ूब की

Interpretation: Rekhta AI

कवि प्रिय की ठंडक पर शिकायत करता है कि प्रेमी टूट रहे हों, तब भी उसे फर्क नहीं पड़ता। “सरापा नाज़” से प्रिय का घमंड और नखरा झलकता है, और “बे-नियाज़ी” को वह जान-बूझकर अपनाई हुई दूरी बताता है। भाव का केंद्र प्रेमी की बेबसी और प्रिय की सुंदर मगर निर्दयी उदासीनता है।

मीर तक़ी मीर

क्या आज-कल से उस की ये बे-तवज्जोही है

मुँह उन ने इस तरफ़ से फेरा है 'मीर' कब का

Interpretation: Rekhta AI

कवि पहले सोचता है कि प्रिय की बेरुख़ी नई है, फिर समझ आता है कि यह तो काफी पुरानी है। “मुँह फेरना” यहाँ साफ़ इंकार और मन से दूर हो जाने का रूपक है। भाव यह है कि दिल देर से सच्चाई मानता है और उम्मीदें खुद को धोखा देती रहती हैं।

मीर तक़ी मीर

सारी दुनिया से बे-नियाज़ी है

वाह मस्त-ए-नाज़ क्या कहना

असर सहबाई

आप जाम-ए-तिश्नगी भर दीजिए अग़्यार का

और यूँ कीजे हमें औरों से कम दे दीजिए

मुमताज़ इक़बाल
बोलिए