महरूमी पर शेर
शायरी में महरूमी की
ज़्यादा-तर सूरतें इश्क़ के इलाक़े से वाबस्ता है। आशिक़ बहुत सी सतहों पर महरूमी का शिकार होता है। सब से पहले बड़ी महरूमी तो उम्र भर का बजुज़ गुज़ारने के बाद विसाल की उम्मीद का भी ख़्वाब हो जाना है। शायरों ने महरूमी के इस गहरे और नाज़ुक तरीन एहसास को बड़ी ख़ूबसूरती के साथ बयान किया है. हमारा ये इन्तिख़ाब आप को महरूमी के बहुत सी सूरतों से आश्ना कराएगा।
ये भी इक रंग है शायद मिरी महरूमी का
कोई हँस दे तो मोहब्बत का गुमाँ होता है
बस एक बार मनाया था जश्न-ए-महरूमी
फिर उस के बाद कोई इब्तिला नहीं आई
इक आबला था सो भी गया ख़ार-ए-ग़म से फट
तेरी गिरह में क्या दिल-ए-अंदोह-गीं रहा
तुम इन लकीरों में इक ख़ुशी भी तलाश कर लो तो मो'जिज़ा है
कि मैं तो बचपन से जानता हूँ मिरी हथेली का नाम दुख है
किसी भी हश्र से महरूम ही रहा वो भी
मिरी तरह का जो किरदार था कहानी में
दिल ये इंसान का हर चीज़ से भर जाता है
क़द्र खो देता है हर वक़्त मयस्सर होना
एक तुम ही नहीं हो पास मिरे
वर्ना किस चीज़ की कमी है मुझे
कभी तो बाढ़ आ के अपने साथ सब बहा गई
कभी किसान बारिशों की राह देखता रहा
फ़ुर्सत के वक़्त इश्क़ से महरूम मैं रहा
फिर ऐसा वक़्त आया कि फ़ुर्सत नहीं बची
यास महरूमी तज़ब्ज़ुब कर्ब ख़ुश-फ़हमी अना
इतने सामाँ थे मिरा तन्हा मकाँ छोटा लगा
जो अज़ल से न था मुक़द्दर में
उस से महरूम हो गया हूँ मैं
लोगों का इक हुजूम था मतलब के वास्ते
चाहे जो दिल से एक भी ऐसा नहीं मिला
शिकवा-ए-बे-चारगी 'मैकश' किसी से क्यों करें
'इश्क़ तो महरूमी-ए-दिल के सिवा कुछ भी नहीं
तिरे बग़ैर वो रातें भी काट दीं हम ने
कि जिन में तेरा तसव्वुर भी रहनुमा न हुआ
उस का ग़म पूछ सको तो पूछो
जिस ने मरने की मसर्रत चाही
देनी थी दाद-ए-तिश्ना-लबी जिस ग़रीब को
वो बज़्म में नहीं है तो साक़ी उदास है