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महरूमी पर शेर

शायरी में महरूमी की

ज़्यादा-तर सूरतें इश्क़ के इलाक़े से वाबस्ता है। आशिक़ बहुत सी सतहों पर महरूमी का शिकार होता है। सब से पहले बड़ी महरूमी तो उम्र भर का बजुज़ गुज़ारने के बाद विसाल की उम्मीद का भी ख़्वाब हो जाना है। शायरों ने महरूमी के इस गहरे और नाज़ुक तरीन एहसास को बड़ी ख़ूबसूरती के साथ बयान किया है. हमारा ये इन्तिख़ाब आप को महरूमी के बहुत सी सूरतों से आश्ना कराएगा।

ये भी इक रंग है शायद मिरी महरूमी का

कोई हँस दे तो मोहब्बत का गुमाँ होता है

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

बस एक बार मनाया था जश्न-ए-महरूमी

फिर उस के बाद कोई इब्तिला नहीं आई

अदा जाफ़री

जो अज़ल से न था मुक़द्दर में

उस से महरूम हो गया हूँ मैं

आबिद अख़्तर

इक आबला था सो भी गया ख़ार-ए-ग़म से फट

तेरी गिरह में क्या दिल-ए-अंदोह-गीं रहा

शाह नसीर

तुम इन लकीरों में इक ख़ुशी भी तलाश कर लो तो मो'जिज़ा है

कि मैं तो बचपन से जानता हूँ मिरी हथेली का नाम दुख है

ख़ालिद नदीम शानी

किसी भी हश्र से महरूम ही रहा वो भी

मिरी तरह का जो किरदार था कहानी में

रेनू नय्यर

दिल ये इंसान का हर चीज़ से भर जाता है

क़द्र खो देता है हर वक़्त मयस्सर होना

सय्यद मोहम्मद वक़ी

एक तुम ही नहीं हो पास मिरे

वर्ना किस चीज़ की कमी है मुझे

अबू शब्बर

जितनी ख़ुशबू थी वार दी तुम पर

अब फ़क़त साँस खींच सकता हूँ

काशिफ़ औरा

घर की चौखट पे आए मुफ़्लिस की

हर सदा बस सदा नहीं होती

बिलाल अख़्तर

कभी तो बाढ़ आ के अपने साथ सब बहा गई

कभी किसान बारिशों की राह देखता रहा

अन्नू रिज़वी

फ़ुर्सत के वक़्त इश्क़ से महरूम मैं रहा

फिर ऐसा वक़्त आया कि फ़ुर्सत नहीं बची

अक्स समस्तीपुरी

बचा हुआ था मिरे पास एक शख़्स 'उमर'

उसे भी मुझ से मगर जनवरी ने छीन लिया

फ़ैज़ान उमर

बे-हुनर लोग हैं मंज़र-ए-'आम पर

और गोशा-नशीं बा-हुनर आदमी

काविश कमाल

यास महरूमी तज़ब्ज़ुब कर्ब ख़ुश-फ़हमी अना

इतने सामाँ थे मिरा तन्हा मकाँ छोटा लगा

फ़रियाद आज़र

शिकवा-ए-बे-चारगी 'मैकश' किसी से क्यों करें

'इश्क़ तो महरूमी-ए-दिल के सिवा कुछ भी नहीं

उस्ताद अज़मत हुसैन ख़ाँ

जिन्हें मैं हासिल हूँ उन को मुझ से हज़ार शिकवे

जिन्हें मैं हासिल नहीं उन्हें है ख़ुदा से शिकवा

मक़सूद सरवरी

लोगों का इक हुजूम था मतलब के वास्ते

चाहे जो दिल से एक भी ऐसा नहीं मिला

अलमास ज़ैनब रिज़वी

वो अपने सूरज तो क्या जलाते मिरे चराग़ों को बेच डाला

फ़ुरात अपने बचा के रक्खे मिरी सबीलें फ़रोख़्त कर दीं

अहमद सलमान

तिरे बग़ैर वो रातें भी काट दीं हम ने

कि जिन में तेरा तसव्वुर भी रहनुमा न हुआ

आल-ए-अहमद सुरूर

उस का ग़म पूछ सको तो पूछो

जिस ने मरने की मसर्रत चाही

अज़ीज़ ग़व्वासी

इस बार तो महरूमी-ए-उम्मीद ग़ज़ब थी

ये भी न रहा याद कि किस शय की तलब थी

मजाज़ आशना

देनी थी दाद-ए-तिश्ना-लबी जिस ग़रीब को

वो बज़्म में नहीं है तो साक़ी उदास है

आल-ए-अहमद सुरूर
बोलिए