ज़रूर अमन का पैग़ाम ले गया था कहीं
परिंदा लौटा लिए पर लहू में डूबे हुए
नशेब-ए-हस्ती से अफ़्सोस हम उभर न सके
फ़राज़-ए-दार से पैग़ाम आए हैं क्या क्या
पैग़ाम तो उन का आया है तुम शहर में 'तिश्ना' आ जाओ
सहरा है पसंदीदा हम को हम शहर में जा कर क्या करते
किन राहों से हो कर आई हो किस गुल का संदेसा लाई हो
हम बाग़ में ख़ुश ख़ुश बैठे थे क्या कर दिया आ के सबा तुम ने
ऐ रंगून में चलती हवा मेरा संदेसा लेती जा
तेरा तो उन की गलियों में आना-जाना होगा ही
मुद्दत हुई उस को कि मिरी ख़ल्वत-ए-शब में
पैग़ाम जो लाई थी सबा याद है अब तक
कब वो पैग़ाम-रसा हो कि मुझे सब्र नहीं
काकुल-ए-ख़म के लिए शे'र रक़म करता हूँ