ज़ख़्म लगा कर उस का भी कुछ हाथ खुला
मैं भी धोका खा कर कुछ चालाक हुआ
हमारी राह से पत्थर उठा कर फेंक मत देना
लगी हैं ठोकरें तब जा के चलना सीख पाए हैं
भले ही लाख हवालों के साथ कहते हैं
मगर वो सिर्फ़ किताबों की बात कहते हैं
उस को दुनिया-दार बनाया
देख रखी थी दुनिया हम ने
बस टूटी कश्ती ही बतला सकती है
इक दरिया की कितनी शक्लें होती हैं
तमाम पिछली मोहब्बतें बे-नक़ाब होंगी
नए त'अल्लुक़ में तजरबा बोलने लगा है
अब दिल में हवस नाम की गंदुम नहीं उगती
ये खेत 'अजब सीम-ज़दा कर दिया उस ने
हैं कुछ नक़्क़ाद ऐसे भी कि जो तह तक नहीं जाते
हवाशी देखते हैं मत्न सारा छोड़ देते हैं
कोई भी चेहरा यहाँ क़ाबिल-ए-वसूक़ नहीं
रफ़ाक़तों में भी 'ए'जाज़' फ़ासला रखिए