Font by Mehr Nastaliq Web

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर

आफ़ताब शाह के शेर

153
Favorite

श्रेणीबद्ध करें

वक़्त की कोख में सुलगता सा

मेरी हस्ती का ग़म पहेली है

हम तो इक तिल पे ही बस ख़ुद को फ़ना कर बैठे

और कितने हैं जमालात कहाँ जानते हैं

आप वाक़िफ़ हैं मिरे दोस्त हसीं लफ़्ज़ों से

बदले लहजों की करामात कहाँ जानते हैं

शायद वो जा चुका है मगर देख लो कहीं

चाहत के इम्तिहान में अब तक यहीं हो

ज़िंदा लोगों को निवालों सा चबाने वाले

मेरी मय्यत पे भी आएँगे ख़ुदा ख़ैर करे

माँग लेते हैं भरोसे पे कि वो दे देगा

हम ख़ता-कार मुनाजात कहाँ जानते हैं

हार को जीत के पहलू में बिठा देते हैं

ऐसा करते हैं चलो हाथ मिला लेते हैं

सच का निखरा लिबास पहने हुए

झूट निकला है वार करने को

निकल गया जो कहानी से मैं तुम्हारी कहीं

किसी को कुछ बताओगे मरते जाओगे

ये उस का खेल है जिस खेल में हर बार वो यारो

मुसलसल हार के भी मुझ से आख़िर जीत जाता है

लिखवा दिए हैं रब को सभी ज़ालिमों के नाम

आएगी सब की बारी ज़रा देखते रहो

डर तो नहीं मगर कहीं पत्तों के शोर से

दिल को गुमाँ है आज कोई हादिसा हो

दर-ब-दर मैं ही नहीं वक़्त भी इन राहों पर

ज़ख़्मी एहसास की संगत में दुखी दिखता है

ज़ात की नरमी ज़ेहनी ठंडक शफ़क़त सारी दुनिया की

उस ने रख दी मस्जिद दिल में जग की सारी माओं में

ज़रबें दे कर पलट के देखा तो

मंफ़ी हासिल था पर वो मुसबत था

हाथ चेहरे पे लगाते ही वो घबरा सी गईं

मेरी चीख़ों के तबस्सुम से मिलीं जब बाँहें

Recitation

बोलिए