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अख़तर इमाम रिज़वी

ग़ज़ल 12

शेर 15

अब भी आती है तिरी याद इस कर्ब के साथ

टूटती नींद में जैसे कोई सपना देखा

अश्क जब दीदा-ए-तर से निकला

एक काँटा सा जिगर से निकला

मुझ को मंज़िल भी पहचान सकी

मैं कि जब गर्द-ए-सफ़र से निकला

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