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अख्तर शुमार

1960 | पाकिस्तान

ग़ज़ल 14

शेर 11

मैं तो इस वास्ते चुप हूँ कि तमाशा बने

तू समझता है मुझे तुझ से गिला कुछ भी नहीं

अभी सफ़र में कोई मोड़ ही नहीं आया

निकल गया है ये चुप-चाप दास्तान से कौन

वो मुस्कुरा के कोई बात कर रहा था 'शुमार'

और उस के लफ़्ज़ भी थे चाँदनी में बिखरे हुए

पुस्तकें 2

Hamen Teri Tamnna Hai

 

1996

Jeevan Tere Naam

 

1994

 

ऑडियो 3

अभी दिल में गूँजती आहटें मिरे साथ हैं

ज़रा सी देर थी बस इक दिया जलाना था

लरज़ उठा है मिरे दिल में क्यूँ न जाने दिया

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI