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मुशायरों में लोकप्रिय, प्रसिद्ध कवयित्री

मुशायरों में लोकप्रिय, प्रसिद्ध कवयित्री

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अपनी मुट्ठी में छुपा कर किसी जुगनू की तरह

हम तिरे नाम को चुपके से पढ़ा करते हैं

कोई आवाज़ आहट कोई हलचल है

ऐसी ख़ामोशी से गुज़रे तो गुज़र जाएँगे

ज़िंदा रहने की ये तरकीब निकाली मैं ने

अपने होने की खबर सब से छुपा ली मैं ने

ठीक है जाओ तअ'ल्लुक़ रखेंगे हम भी

तुम भी वा'दा करो अब याद नहीं आओगे

तुझ को आवाज़ दूँ और दूर तलक तू मिले

ऐसे सन्नाटों से अक्सर मुझे डर लगता है

अभी तो चाक पे जारी है रक़्स मिट्टी का

अभी कुम्हार की निय्यत बदल भी सकती है

हर एक सज्दे में दिल को तिरा ख़याल आया

ये इक गुनाह इबादत में बार बार हुआ

जब भी फ़ुर्सत मिली हंगामा-ए-दुनिया से मुझे

मेरी तन्हाई को बस तेरा पता याद आया

उदासी शाम तन्हाई कसक यादों की बेचैनी

मुझे सब सौंप कर सूरज उतर जाता है पानी में

हिज्र की रात और पूरा चाँद

किस क़दर है ये एहतिमाम ग़लत

जिन के मज़बूत इरादे बने पहचान उन की

मंज़िलें आप ही हो जाती हैं आसान उन की

हम हवा से बचा रहे थे जिन्हें

उन चराग़ों से जल गए शायद

ब'अद मुद्दत मुझे नींद आई बड़े चैन की नींद

ख़ाक जब ओढ़ ली और ख़ाक बिछा ली मैं ने

मिरे वजूद में शामिल था वो हवा की तरह

सो हर तरफ़ था मिरे बस मिरी नज़र में था

फिर ज़मीं खींच रही है मुझे अपनी जानिब

मैं रुकूँ कैसे के पर्वाज़ अभी बाक़ी है

जाने कब कैसे गिरफ़्तार-ए-मोहब्बत हुए हम

जाने कब ढल गए इक़रार में इंकार के रंग

बिन आवाज़ पुकारें हर-दम नाम तिरा

शायद हम भी पागल होने वाले हैं

शदीद धूप में सारे दरख़्त सूख गए

बस इक दुआ का शजर था जो बे-समर हुआ

अजब सी कशमकश तमाम उम्र साथ साथ थी

रखा जो रूह का भरम तो जिस्म मेरा मर गया

बंद रहते हैं जो अल्फ़ाज़ किताबों में सदा

गर्दिश-ए-वक़्त मिटा देती है पहचान उन की

दिल के गुलशन में तिरे प्यार की ख़ुश्बू पा कर

रंग रुख़्सार पे फूलों से खिला करते हैं

अब भी अक्सर शब-ए-तन्हाई में कुछ तहरीरें

चाँद के अक्स से हो जाती हैं रौशन रौशन

वो इक चराग़ जो जलता है रौशनी के लिए

उसी के ज़ेर-ए-तहफ़्फ़ुज़ है तीरगी का वजूद

अयाँ थे जज़्बा-ए-दिल और बयाँ थे सारे ख़याल

कोई भी पर्दा था जब के थे हिजाब में हम

किसी के वास्ते तस्वीर-ए-इंतिज़ार थे हम

वो गया कहाँ ख़त्म इंतिज़ार हुआ

मौसम-ए-गुल पर ख़िज़ाँ का ज़ोर चल जाता है क्यूँ

हर हसीं मंज़र बहुत जल्दी बदल जाता है क्यूँ

ख़्वाहिशें ख़्वाब दिखाती हैं तिरे मिलने का

ख़्वाब से कह दे कि ता'बीर की सूरत आए

कोई मिला ही नहीं जिस से हाल-ए-दिल कहते

मिला तो रह गए लफ़्ज़ों के इंतिख़ाब में हम

गहरे समुंदरों में उतरने की ले के आस

बैठे हुए है एक किनारे हमारे ख़्वाब

बंदिशों को तोड़ने की कोशिशें करती हुई

सर पटकती लहर तेरी आजिज़ी अच्छी लगी

अँधेरी शब का ये ख़्वाब-मंज़र मुझे उजालों से भर रहा है

ये रात इतनी तवील कर दे कि ता-क़यामत सहर आए

कुछ कड़े टकराओ दे जाती है अक्सर रौशनी

जूँ चमक उठती है कोई बर्क़ तलवारों के बेच

ज़ात में जिस की हो ठहराव ज़मीं की मानिंद

फ़िक्र में उस की समुंदर की सी वुसअ'त होगी

कूज़ा-गर ने जब मेरी मिटी से की तख़्लीक़-ए-नौ

हो गए ख़ुद जज़्ब मुझ में आग और पानी हवा