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अम्मार इक़बाल

1989 | पाकिस्तान

मैं ने चाहा था ज़ख़्म भर जाएँ

ज़ख़्म ही ज़ख़्म भर गए मुझ में

एक ही बात मुझ में अच्छी है

और मैं बस वही नहीं करता

मैं ने तस्वीर फेंक दी है मगर

कील दीवार में गड़ी हुई है

उस ने नासूर कर लिया होगा

ज़ख़्म को शाएरी बनाते हुए

एक दरवेश को तिरी ख़ातिर

सारी बस्ती से इश्क़ हो गया है

ख़ुद ही जाने लगे थे और ख़ुद ही

रास्ता रोक कर खड़े हुए हैं

मैं आईनों को देखे जा रहा था

अब इन से बात भी करने लगा हूँ

कैसे कैसे बना दिए चेहरे

अपनी बे-चेहरगी बनाते हुए

कैसा मुझ को बना दिया 'अम्मार'

कौन सा रंग भर गए मुझ में