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अक़ील शादाब

1940

अक़ील शादाब के शेर

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बराए-नाम सही कोई मेहरबान तो है

हमारे सर पे भी होने को आसमान तो है

ज़िंदगी जिस के तसव्वुर में बसर की हम ने

हाए वो शख़्स हक़ीक़त में कहानी निकला

ये और बात कि वो अब यहाँ नहीं रहता

मगर ये उस का बसाया हुआ मकान तो है

मुझे किसी ने सुना ही नहीं तवज्जोह से

मैं बद-ज़बान सदा-ए-करख़्त हूँ शायद

ज़िंदगी मुझ को मिरी नज़रों में शर्मिंदा कर

मर चुका है जो बहुत पहले उसे ज़िंदा कर

गुमान ही असासा था यक़ीन का

यक़ीन ही गुमान में नहीं रहा

जो अपने आप से बढ़ कर हमारा अपना था

उसे क़रीब से देखा तो दूर का निकला

शायद कोई कमी मेरे अंदर कहीं पे है

मैं आसमाँ पे हूँ मिरा साया ज़मीं पे है

हवस का रंग चढ़ा उस पे और उतर भी गया

वो ख़ुद ही जम्अ हुआ और ख़ुद बिखर भी गया

है लफ़्ज़-ओ-मा'नी का रिश्ता ज़वाल-आमादा

ख़याल पैदा हुआ भी था कि मर भी गया

आँधियाँ सब कुछ उड़ा कर ले गईं

पेड़ पर पत्ता फल दामन में था

मिरी तलाश में है कोई ऐसा लगता है

किसी का गुम-शुदा 'शादाब' रख़्त हूँ शायद

हुआ जो सहल उस के घर का रास्ता

मज़ा ही कुछ तकान में नहीं रहा

हर एक लम्हा सरों पे है सानेहा ऐसा

हर एक साँस गुज़रती है हादसात ऐसी

था जिस पे मेरी ज़िंदगी का इंहिसार

उसी का नाम ध्यान में नहीं रहा

मैं अपने आप को किस तरह संगसार करूँ

मिरे ख़िलाफ़ मिरा दिल अगर गवाही दे

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