aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर
Ateequllah's Photo'

अतीक़ुल्लाह

1941 | दिल्ली, भारत

ख्यातिप्राप्त आलोचक और शायर, दिल्ली विश्वविद्यालय में उर्दू के प्रोफ़ेसर रहे

ख्यातिप्राप्त आलोचक और शायर, दिल्ली विश्वविद्यालय में उर्दू के प्रोफ़ेसर रहे

अतीक़ुल्लाह के शेर

755
Favorite

श्रेणीबद्ध करें

आइना आइना तैरता कोई अक्स

और हर ख़्वाब में दूसरा ख़्वाब है

कुछ बदन की ज़बान कहती थी

आँसुओं की ज़बान में था कुछ

वो रात नींद की दहलीज़ पर तमाम हुई

अभी तो ख़्वाब पे इक और ख़्वाब धरना था

रेल की पटरी ने उस के टुकड़े टुकड़े कर दिए

आप अपनी ज़ात से उस को बहुत इंकार था

इस गली से उस गली तक दौड़ता रहता हूँ मैं

रात उतनी ही मयस्सर है सफ़र उतना ही है

लम्स की शिद्दतें महफ़ूज़ कहाँ रहती हैं

जब वो आता है कई फ़ासले कर जाता है

ज़रा से रिज़्क़ में बरकत भी कितनी होती थी

और इक चराग़ से कितने चराग़ जलते थे

फ़ज़ा में हाथ तो उट्ठे थे एक साथ कई

किसी के वास्ते कोई दुआ करता था

हर मंज़र के अंदर भी इक मंज़र है

देखने वाला भी तो हो तय्यार मुझे

किस के पैरों के नक़्श हैं मुझ में

मेरे अंदर ये कौन चलता है

किसी इक ज़ख़्म के लब खुल गए थे

मैं इतनी ज़ोर से चीख़ा नहीं था

तुम ने तो फ़क़त उस की रिवायत ही सुनी है

हम ने वो ज़माना भी गुज़रते हुए देखा

हम ज़मीं की तरफ़ जब आए थे

आसमानों में रह गया था कुछ

अपने सूखे हुए गुल-दान का ग़म है मुझ को

आँख में अश्क का क़तरा भी नहीं है कोई

ये देखा जाए वो कितने क़रीब आता है

फिर इस के बाद ही इंकार कर के देखा जाए

मुझ में ख़ुद मेरी अदम-मौजूदगी शामिल रही

वर्ना इस माहौल में जीना बड़ा दुश्वार था

कहाँ पहुँच के हदें सब तमाम होती हैं

इस आसमान से नीचे उतर के देखा जाए

कोई शब ढूँडती थी मुझ को और मैं

तिरी नींदों में जा कर सो गया था

पानी था मगर अपने ही दरिया से जुदा था

चढ़ते हुए देखा उतरते हुए देखा

ख़्वाबों की किर्चियाँ मिरी मुट्ठी में भर जाए

आइंदा लम्हा अब के भी यूँही गुज़र जाए

वो बात थी तो कई दूसरे सबब भी थे

ये बात है तो सबब दूसरा नहीं होगा

अभी तो काँटों-भरी झाड़ियों में अटका है

कभी दिखाई दिया था हरा-भरा वो भी

ये राह-ए-तलब यारो गुमराह भी करती है

सामान उसी का था जो बे-सर-ओ-सामाँ था

बड़ी चीज़ है ये सुपुर्दगी का महीन पल

समझ सको तो मुझे गँवा के भी देखना

दिन के हंगामे जिला देते हैं मुझ को वर्ना

सुब्ह से पहले कई मर्तबा मर जाता हूँ

तिरे फ़लक ही से टूटने वाली रौशनी के हैं अक्स सारे

कहीं कहीं जो चमक रहे हैं हुरूफ़ मेरी इबारतों में

सफ़र-गिरफ़्ता रहे कुश्तगान-ए-नान-ओ-नमक

हमारे हक़ में कोई फ़ैसला करता था

कुछ और दिन अभी इस जा क़याम करना था

यहाँ चराग़ वहाँ पर सितारा धरना था

Recitation

Jashn-e-Rekhta | 8-9-10 December 2023 - Major Dhyan Chand National Stadium, Near India Gate - New Delhi

GET YOUR PASS
बोलिए