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अज़ीज़ वारसी

1924 - 1989 | दिल्ली, भारत

सूफ़ियाना परंपरा के प्रतिष्ठित, अपनी अंतर्ज्ञानपूर्ण शायरी, वारसी सिलसिले से आध्यात्मिक जुड़ाव और असगर गोंडवी के रंग से प्रभावित कलाम के लिए प्रसिद्ध

सूफ़ियाना परंपरा के प्रतिष्ठित, अपनी अंतर्ज्ञानपूर्ण शायरी, वारसी सिलसिले से आध्यात्मिक जुड़ाव और असगर गोंडवी के रंग से प्रभावित कलाम के लिए प्रसिद्ध

अज़ीज़ वारसी के शेर

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तुम्हारी ज़ात से मंसूब है दीवानगी मेरी

तुम्हीं से अब मिरी दीवानगी देखी नहीं जाती

दिल में अब कुछ भी नहीं उन की मोहब्बत के सिवा

सब फ़साने हैं हक़ीक़त में हक़ीक़त के सिवा

कैसे मुमकिन है कि हम दोनों बिछड़ जाएँगे

इतनी गहराई से हर बात को सोचा करो

ग़म-ए-उक़्बा ग़म-ए-दौराँ ग़म-ए-हस्ती की क़सम

और भी ग़म हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

इक वक़्त था कि दिल को सुकूँ की तलाश थी

और अब ये आरज़ू है कि दर्द-ए-निहाँ रहे

मोहब्बत लफ़्ज़ तो सादा सा है लेकिन 'अज़ीज़' इस को

मता-ए-दिल समझते थे मता-ए-दिल समझते हैं

मुझ से ये पूछ रहे हैं मिरे अहबाब 'अज़ीज़'

क्या मिला शहर-ए-सुख़न में तुम्हें शोहरत के सिवा

तुम पे इल्ज़ाम जाए सफ़र में कोई

रास्ता कितना ही दुश्वार हो ठहरा करो

जहाँ में हम जिसे भी प्यार के क़ाबिल समझते हैं

हक़ीक़त में उसी को ज़ीस्त का हासिल समझते हैं

ख़ुशी महसूस करता हूँ ग़म महसूस करता हूँ

बहर-आलम तुम्हारा ही करम महसूस करता हूँ

तिरी महफ़िल में फ़र्क़-ए-कुफ़्र-ओ-ईमाँ कौन देखेगा

फ़साना ही नहीं कोई तो उनवाँ कौन देखेगा

मिरी तक़दीर से पहले सँवरना जिन का मुश्किल है

तिरी ज़ुल्फ़ों में कुछ ऐसे भी ख़म महसूस करता हूँ

मोहतसिब आओ चलें आज तो मय-ख़ाने में

एक जन्नत है वहाँ आप की जन्नत के सिवा

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