अज़्म शाकरी के शेर
आज की रात दिवाली है दिए रौशन हैं
आज की रात ये लगता है मैं सो सकता हूँ
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ज़ख़्म जो तुम ने दिया वो इस लिए रक्खा हरा
ज़िंदगी में क्या बचेगा ज़ख़्म भर जाने के ब'अद
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वक़्त-ए-रुख़्सत आब-दीदा आप क्यूँ हैं
जिस्म से तो जाँ हमारी जा रही है
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टैग : आब दीदा
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मैं ने इक शहर हमेशा के लिए छोड़ दिया
लेकिन उस शहर को आँखों में बसा लाया हूँ
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यूँ बार बार मुझ को सदाएँ न दीजिए
अब वो नहीं रहा हूँ कोई दूसरा हूँ मैं
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आँसुओं से लिख रहे हैं बेबसी की दास्ताँ
लग रहा है दर्द की तस्वीर बन जाएँगे हम
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सारे दुख सो जाएँगे लेकिन इक ऐसा ग़म भी है
जो मिरे बिस्तर पे सदियों का सफ़र रख जाएगा
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ज़िंदगी मेरी मुझे क़ैद किए देती है
इस को डर है मैं किसी और का हो सकता हूँ
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अजीब हालत है जिस्म-ओ-जाँ की हज़ार पहलू बदल रहा हूँ
वो मेरे अंदर उतर गया है मैं ख़ुद से बाहर निकल रहा हूँ
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शब की आग़ोश में महताब उतारा उस ने
मेरी आँखों में कोई ख़्वाब उतारा उस ने
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ये जो दीवार अँधेरों ने उठा रक्खी है
मेरा मक़्सद इसी दीवार में दर करना है
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मेरे जिस्म से वक़्त ने कपड़े नोच लिए
मंज़र मंज़र ख़ुद मेरी पोशाक हुआ
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अगर साए से जल जाने का इतना ख़ौफ़ था तो फिर
सहर होते ही सूरज की निगहबानी में आ जाते
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मैं उस को ढूँढने निकला तो ख़ुद को ले आया
वो मेरी ज़ात के अंदर कहीं छुपा निकला
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ये नक़ली सज्दे ये दस्त-बोसी ये झूटी 'इज़्ज़त तुम्हें मुबारक
हम एक मिट्टी के आदमी हैं मज़ार होने से डर रहे हैं
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सीना-ए-सब्र पे इक बार-ए-अलम रह गया है
एक पत्ता ही सही शाख़ पे नम रह गया है
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परिंदे यादों के आते हैं लौट जाते हैं
बदन की रेत पे कोई शजर ज़रूरी है
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रौशनियाँ चली गईं शाम के इक़्तिदार में
तीरा-शबी का अज़दहा सारे दिए निगल गया
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उतर ही जाएगा इक दिन ख़ुमार गंदुम का
ये क्या कि हर घड़ी रफ़्तार-ए-जाँ को तकते रहो
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वो चाँद सी हथेलियाँ वो रौशनी सी उँगलियाँ
ये किस ने मुझ को छू लिया बुझे चराग़ जल गए
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वही शराब से ख़ाली गिलास भरते हुए
मैं चढ़ रहा हूँ अभी सीढ़ियाँ उतरते हुए
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