बूम मेरठी के शेर
उन से छींके से कोई चीज़ उतरवाई है
काम का काम है अंगड़ाई की अंगड़ाई है
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टैग : अंगड़ाई
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शम्अ कुछ फूकने के वास्ते घर पर नहीं जाती
फ़िदा उल्लू का पट्ठा आ के ख़ुद परवाना होता है
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गया बचपन शबाब आया बुढ़ापा आने वाला है
मगर मैं तो अभी तक आप को बच्चा समझता हूँ
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न पूछो तुम को और दुश्मन को दिल में क्या समझता हूँ
उसे उल्लू तुम्हें उल्लू का मैं पट्ठा समझता हूँ
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बूम साहब का अजब रंग निराला देखा
यार यारों में है अग़्यार है अग़्यारों में
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बस अब बारह बरस के हो गए ख़त्ना करा डालो
मुसलमानी न हो जिस की मुसलमाँ हो नहीं सकता
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पड़ें जूते हज़ारों सर पे लेकिन मैं न निकलूँगा
तेरे कूचे के हम-सर बाग़-ए-रिज़वाँ हो नहीं सकता
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ले के उस शोख़ को आराम से छत पर सोया
ग़ैर को डाल दिया बाँध के शहतीर के साथ
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