जलील ’आली’

ग़ज़ल 42

अशआर 20

दिल आबाद कहाँ रह पाए उस की याद भुला देने से

कमरा वीराँ हो जाता है इक तस्वीर हटा देने से

रास्ता सोचते रहने से किधर बनता है

सर में सौदा हो तो दीवार में दर बनता है

दिल पे कुछ और गुज़रती है मगर क्या कीजे

लफ़्ज़ कुछ और ही इज़हार किए जाते हैं

अपने दिए को चाँद बताने के वास्ते

बस्ती का हर चराग़ बुझाना पड़ा हमें

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दुनिया तो है दुनिया कि वो दुश्मन है सदा की

सौ बार तिरे इश्क़ में हम ख़ुद से लड़े हैं

पुस्तकें 4

 

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