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जमाल अब्बास फ़हमी

1962 | अमरोहा, भारत

जमाल अब्बास फ़हमी के शेर

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तुझ से मिलने का बहाना तो कोई चाहिए था

हम ने वो एक बहाना कभी ढूँडा ही नहीं

दोस्ती इक दिन दुश्मन से हो सकती है

सोच के ये लड़ने का इरादा छोड़ दिया

कोई तो ऐसा हो जिस से मैं दिल की बात करूँ

सो अपने आप से ही बात करता रहता हूँ

ठुकरा के चले आए ख़ुद्दार तबीअ'त है

हम उन की इनायत को ख़ैरात समझते हैं

नहीं ये मेहंदी नहीं है तुम्हारे हाथों पर

किसी का ख़ून-ए-तमन्ना लगाए बैठे हो

जब ख़त्म हुई दिल से ईसार की गुंजाइश

आँगन में निकल आई दीवार की गुंजाइश

तज़्किरे हैं तो फ़क़त क़त्ल के अंदाज़ के हैं

शहर में क़त्ल का मेरे कोई चर्चा ही नहीं

मेरी ख़ुद-फ़रामोशी अब यहाँ तक पहूँची

पूछता हूँ लोगों से तुम ने मुझ को देखा है

तुम अपना दरिया यहाँ से समेट लो वर्ना

हमारी प्यास की गर्मी उसे जला देगी

कोई दस्त-ए-मसीहाई करम-अंदाज़ होने तक

नमक-पाशी का ज़ख़्मों को मज़ा भी लग चुका होगा

सर को नेज़ा नसीब होता है

सरफ़राज़ी यूँही नहीं मिलती

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