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जमुना प्रसाद राही

अलीगढ़, भारत

ग़ज़ल 13

शेर 13

कश्तियाँ डूब रही हैं कोई साहिल लाओ

अपनी आँखें मिरी आँखों के मुक़ाबिल लाओ

जो सुनते हैं कि तिरे शहर में दसहरा है

हम अपने घर में दिवाली सजाने लगते हैं

गाँव से गुज़रेगा और मिट्टी के घर ले जाएगा

एक दिन दरिया सभी दीवार दर ले जाएगा

सदियों का इंतिशार फ़सीलों में क़ैद था

दस्तक ये किस ने दी कि इमारत बिखर गई

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अजीब आग लगा कर कोई रवाना हुआ

मिरे मकान को जलते हुए ज़माना हुआ

पुस्तकें 2

Bazgasht-e-Ghalib

 

2016

Safarguzar

 

2012

 

ऑडियो 11

कुछ तो सच्चाई के शहकार नज़र में आते

कश्तियाँ डूब रही हैं कोई साहिल लाओ

कोहसार-ए-तग़ाफ़ुल को सदा काट रही है

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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