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जावेद लख़नवी

1862 - 1922 | लखनऊ, भारत

जावेद लख़नवी के शेर

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कहीं ऐसा हो मर जाऊँ मैं हसरत ही हसरत में

जो लेना हो तो ले लो सब से पहले इम्तिहाँ मेरा

शब-ए-वस्ल क्या जाने क्या याद आया

वो कुछ आप ही आप शर्मा रहे हैं

तुम पास जो आए खो गए हम

जब तुम मिले तो जुस्तुजू की

तुम्हें है नश्शा जवानी का हम में ग़फ़लत-ए-इश्क़

इख़्तियार में तुम हो इख़्तियार में हम

ये इक बोसे पे इतनी बहस ये ज़ेबा नहीं तुम को

नहीं है याद मुझ को ख़ैर अच्छा ले लिया होगा

सूरत यूँ दिखाए उन्हें बार बार चाँद

पैदा करे हसीनों में कुछ ए'तिबार चाँद

सब ख़त तमाम कर चुके पढ़ पढ़ के शौक़ से

वाँ थम गए जहाँ पे मिरा नाम गया

उम्मीद का बुरा हो समझा कि आप आए

बे-वज्ह शब को हिल कर ज़ंजीर-ए-दर ने मारा

तुम दिए जाओ यूँही हम को हवा दामन की

हम से बेहोश नहीं होश में आने वाले

ख़ाक उड़ के हमारी तिरे कूचे में पहुँचती

तक़दीर थी ये भी कि हवा भी चली आज

है दिलों का वही जो दाना-ए-तस्बीह का हाल

यूँ मिले हैं हैं दर-अस्ल जुदा एक से एक

उन को तो सहल है वो ग़ैर के घर जाएँगे

हम जो उस दर से उठेंगे तो किधर जाएँगे

जिस जगह जाएँ बना लें तिरे वहशी सहरा

ख़ाक ले आए हैं मुट्ठी में बयाबानों की

अभी तो आग सीने में कहीं कम है कहीं ज़ाइद

अगर मिल पाएँगे आपस में सब छाले तो क्या होगा

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