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कैफ़ी बिलग्रामी

शेर 4

इक इक क़दम पे रक्खी है यूँ ज़िंदगी की लाज

ग़म का भी एहतिराम किया है ख़ुशी के साथ

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मुझे चाक-ए-गरेबाँ पर हँसी आई तो है लेकिन

मिरे हँसने पे उन की आँख भरी आई तो क्या होगा

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हम ने इरादा तर्क-ए-तमन्ना का जब किया

तेरा ख़याल दिल-ए-नाकाम गया

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