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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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कैफ़ी हैदराबादी

1880 - 1920

कैफ़ी हैदराबादी

ग़ज़ल 6

नज़्म 2

 

अशआर 12

सुब्ह को खुल जाएगा दोनों में क्या याराना है

शम्अ परवाना की है या शम्अ का परवाना है

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वो अब क्या ख़ाक आए हाए क़िस्मत में तरसना था

तुझे अब्र-ए-रहमत आज ही इतना बरसना था

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हम आप को देखते थे पहले

अब आप की राह देखते हैं

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मोहब्बत में क्या क्या कुछ जौर होगा

अभी क्या हुआ है अभी और होगा

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वही नज़र में है लेकिन नज़र नहीं आता

समझ रहा हूँ समझ में मगर नहीं आता

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पुस्तकें 4

 

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