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मुस्तफ़ा शहाब

इंग्लैंड

मुस्तफ़ा शहाब

ग़ज़ल 21

शेर 22

ज़ेहन में याद के घर टूटने लगते हैं 'शहाब'

लोग हो जाते हैं जी जी के पुराने कितने

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ऐसा भी कभी हो मैं जिसे ख़्वाब में देखूँ

जागूँ तो वही ख़्वाब की ताबीर बताए

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गो तर्क-ए-तअल्लुक़ में भी शामिल हैं कई दुख

बे-कैफ़ तअल्लुक़ के भी आज़ार बहुत हैं

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कहा था मैं ने खो कर भी तुझे ज़िंदा रहूँगा

वो ऐसा झूट था जिस को निभाना पड़ गया है

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शायद वो भूली-बिसरी हो आरज़ू कोई

कुछ और भी कमी सी है तेरी कमी के साथ

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पुस्तकें 4

आंधी सर-ए-शाम

 

2003

Kaghaz Ki Kashtiyan

 

2012

सफ़र अामादा

 

1999

शाम ढले सवेरा

 

1996