Font by Mehr Nastaliq Web

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर
Nadim Nadeem's Photo'

नादिम नदीम

1994 | कासगंज, भारत

नई नस्ल के नुमाइंदा शायरों में शामिल, आम फ़हम ज़बान में रिवायती और नाज़ुक एहसासात की शायरी, ख़ास तौर पर इश्क़िया मज़ामीन का बयान

नई नस्ल के नुमाइंदा शायरों में शामिल, आम फ़हम ज़बान में रिवायती और नाज़ुक एहसासात की शायरी, ख़ास तौर पर इश्क़िया मज़ामीन का बयान

नादिम नदीम के शेर

661
Favorite

श्रेणीबद्ध करें

इन से उम्मीद रख हैं ये सियासत वाले

ये किसी से भी मोहब्बत नहीं करने वाले

सवाल ये है हवा आई किस इशारे पर

चराग़ किस के बुझे ये सवाल थोड़ी है

पर कटे पंछियों से पूछते हो

तुम में उड़ने का हौसला है क्या

फूल कितने उदास लगते हैं

ख़ुदा इन को तितलियाँ दे दे

उस ने दो लफ़्ज़ में जो बातें कहीं थी मुझ से

उस को मैं सोचने बैठूँ तो ज़माने लग जाएँ

हिज्र-ए-जानाँ में भी आँसू नहीं आए मेरे

ख़ुश्क सहराओं में बरसात कभी तो होगी

मैं जिस दरिया में काँटा डालता था

सुना है अब वहाँ मछली नहीं है

वन-वास नहीं होते सभी चौदह बरस के

कुछ लोग हमेशा को चले जाते हैं वन में

आवाज़ लगाई कभी तलवार गिराई

आगाह किया हम ने उसे वार से पहले

इक रात की देवी के परस्तार हैं हम लोग

देती है मिसालें जो तिरे साँवले-पन की

क्या नय्या और कैसा खेवय्या चाहने वालो डूब मरो

इन आँखों के दरियाओं में आज भँवर भरपूर पड़े हैं

हम ने भुगता है पता है हमें क्या है दुनिया

सिर्फ़ इक दाना-ए-गंदुम की सज़ा है दुनिया

आह को साज़ बनाते हैं दुखों की रुत में

दिल-शिकस्ता हैं पर आवाज़ सँभाले हुए हैं

एक हम ख़ुद के हैं इक घर के हैं इक दुनिया के

तुम अगर पा भी सकोगे तो हमें चौथाई

मिरे दोस्त मिरे साथ तिरी यादों की

रेत इतनी है हुआ जाता है सहरा चेहरा

प्रेम-नगर में माँगने वाले भूखों मर जाते हैं

इस बस्ती में खा नहीं सकता कोई छीन-झपट के

दीं-दार लोग रब को मनाने में मस्त हैं

दरवेश अपने नाचने गाने में मस्त हैं

था सफ़र हम पे मुसल्लत सो हमें चलना था

वर्ना ये दिल तो कई बार हुआ रुक जाते

मैं हूँ वो है सहरा है

और इक पेड़ का साया है

कैसे कैसे लोग वुजूद की ज़द में कर मर गए

इस दरिया की भेंट चढ़े कैसे कैसे तैराक

ख़मोशी खींच के लाई मुझे वुजूद तलक

वुजूद खींच के लाया है मुझ को ला की तरफ़

बिखेरता है रौशनी रिदा-ए-आसमाँ से वो

सितारे जैसे ओढ़नी में पड़ गए हों दाग़ से

बदलते मौसमों का हाथ थामे चलने वालो

सुकूँ पहुँचाएगी तुम को शजर-कारी हमारी

वहशत नहीं है रक़्स-ए-मसर्रत है दश्त में

पेड़ों की शक्ल में ये मिरे चार-सू हो तुम

दौड़ती हाँपती आई थी उदासी मुझ तक

मेरे सीने से लगी और ज़रा सुस्ताई

Recitation

Jashn-e-Rekhta 10th Edition | 5-6-7 December Get Tickets Here

बोलिए