नादिम नदीम के शेर
इन से उम्मीद न रख हैं ये सियासत वाले
ये किसी से भी मोहब्बत नहीं करने वाले
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सवाल ये है हवा आई किस इशारे पर
चराग़ किस के बुझे ये सवाल थोड़ी है
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पर कटे पंछियों से पूछते हो
तुम में उड़ने का हौसला है क्या
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फूल कितने उदास लगते हैं
ऐ ख़ुदा इन को तितलियाँ दे दे
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उस ने दो लफ़्ज़ में जो बातें कहीं थी मुझ से
उस को मैं सोचने बैठूँ तो ज़माने लग जाएँ
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हिज्र-ए-जानाँ में भी आँसू नहीं आए मेरे
ख़ुश्क सहराओं में बरसात कभी तो होगी
मैं जिस दरिया में काँटा डालता था
सुना है अब वहाँ मछली नहीं है
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वन-वास नहीं होते सभी चौदह बरस के
कुछ लोग हमेशा को चले जाते हैं वन में
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आवाज़ लगाई कभी तलवार गिराई
आगाह किया हम ने उसे वार से पहले
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इक रात की देवी के परस्तार हैं हम लोग
देती है मिसालें जो तिरे साँवले-पन की
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क्या नय्या और कैसा खेवय्या चाहने वालो डूब मरो
इन आँखों के दरियाओं में आज भँवर भरपूर पड़े हैं
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हम ने भुगता है पता है हमें क्या है दुनिया
सिर्फ़ इक दाना-ए-गंदुम की सज़ा है दुनिया
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आह को साज़ बनाते हैं दुखों की रुत में
दिल-शिकस्ता हैं पर आवाज़ सँभाले हुए हैं
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एक हम ख़ुद के हैं इक घर के हैं इक दुनिया के
तुम अगर पा भी सकोगे तो हमें चौथाई
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ऐ मिरे दोस्त मिरे साथ तिरी यादों की
रेत इतनी है हुआ जाता है सहरा चेहरा
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प्रेम-नगर में माँगने वाले भूखों मर जाते हैं
इस बस्ती में खा नहीं सकता कोई छीन-झपट के
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दीं-दार लोग रब को मनाने में मस्त हैं
दरवेश अपने नाचने गाने में मस्त हैं
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था सफ़र हम पे मुसल्लत सो हमें चलना था
वर्ना ये दिल तो कई बार हुआ रुक जाते
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कैसे कैसे लोग वुजूद की ज़द में आ कर मर गए
इस दरिया की भेंट चढ़े कैसे कैसे तैराक
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ख़मोशी खींच के लाई मुझे वुजूद तलक
वुजूद खींच के लाया है मुझ को ला की तरफ़
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बिखेरता है रौशनी रिदा-ए-आसमाँ से वो
सितारे जैसे ओढ़नी में पड़ गए हों दाग़ से
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बदलते मौसमों का हाथ थामे चलने वालो
सुकूँ पहुँचाएगी तुम को शजर-कारी हमारी
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वहशत नहीं है रक़्स-ए-मसर्रत है दश्त में
पेड़ों की शक्ल में ये मिरे चार-सू हो तुम
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दौड़ती हाँपती आई थी उदासी मुझ तक
मेरे सीने से लगी और ज़रा सुस्ताई
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