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वाजिद अली शाह अख़्तर

1822 - 1887 | लखनऊ, भारत

अवध के आखि़री नवाब/भारतीय संगीत, नृत्य, नाटक के संरक्षक

अवध के आखि़री नवाब/भारतीय संगीत, नृत्य, नाटक के संरक्षक

ग़ज़ल 24

शेर 12

उल्फ़त ने तिरी हम को तो रक्खा कहीं का

दरिया का जंगल का समा का ज़मीं का

दर-ओ-दीवार पे हसरत से नज़र करते हैं

ख़ुश रहो अहल-ए-वतन हम तो सफ़र करते हैं

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यही तशवीश शब-ओ-रोज़ है बंगाले में

लखनऊ फिर कभी दिखलाए मुक़द्दर मेरा

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ई-पुस्तक 22

अाख़िरी ताजदार-ए-अवध

 

1945

अवध अंडर वाजिद अली शाह

 

1968

बहर-ए-उल्फ़त

 

1985

Bahr-e-Ulfat

 

 

Daftar-e-Hasrat

Deewan-e-Anjum

1905

Dariya-e-Tashshuq

 

 

Dariya-e-Tashshuq

 

1885

Huzn-e-Akhtar

 

2013

Huzn-e-Akhtar

 

1922

इंतिख़ाब-ए-वाजिद अली शाह अख़तर

 

1984

ऑडियो 5

उल्फ़त ने तिरी हम को तो रक्खा न कहीं का

ग़ुंचा-ए-दिल खिले जो चाहो तुम

गर्मियाँ शोख़ियाँ किस शान से हम देखते हैं

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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