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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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Waseem Barelvi

1940 | Bareilly, India

Popular poet having a vast mass following.

Popular poet having a vast mass following.

Waseem Barelvi

Ghazal 65

Nazm 10

Sher-o-Shayari 86

tujhe paane koshish meñ kuchh itnā kho chukā huuñ maiñ

ki mil bhī agar jaa.e to ab milne ġham hogā

tujhe pane ki koshish mein kuchh itna kho chuka hun main

ki tu mil bhi agar jae to ab milne ka gham hoga

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apne chehre se jo zāhir hai chhupā.eñ kaise

terī marzī ke mutābiq nazar aa.eñ kaise

how do I hide the obvious, which from my face is clear

as you wish me to be seen, how do I thus appear

apne chehre se jo zahir hai chhupaen kaise

teri marzi ke mutabiq nazar aaen kaise

how do I hide the obvious, which from my face is clear

as you wish me to be seen, how do I thus appear

jahāñ rahegā vahīñ raushnī luTā.egā

kisī charāġh apnā makāñ nahīñ hotā

EXPLANATION #1

इस शे’र में कई अर्थ ऐसे हैं जिनसे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वसीम बरेलवी शे’र में अर्थ के साथ कैफ़ियत पैदा करने की कला से परिचित हैं। ‘जहाँ’ के सन्दर्भ से ‘वहीं’ और इन दोनों के सन्दर्भ से ‘मकाँ’, ‘चराग़’ के सन्दर्भ से ‘रौशनी’ और इससे बढ़कर ‘किसी’ ये सब ऐसे लक्षण हैं जिनसे शे’र में अर्थोत्पत्ति का तत्व पैदा हुआ है।

शे’र के शाब्दिक अर्थ तो ये हो सकते हैं कि चराग़ अपनी रौशनी से किसी एक मकाँ को रौशन नहीं करता है, बल्कि जहाँ जलता है वहाँ की फ़िज़ा को प्रज्वलित करता है। इस शे’र में एक शब्द 'मकाँ' केंद्र में है। मकाँ से यहाँ तात्पर्य मात्र कोई ख़ास घर नहीं बल्कि स्थान है।

अब आइए शे’र के भावार्थ पर प्रकाश डालते हैं। दरअसल शे’र में ‘चराग़’, ‘रौशनी’ और ‘मकाँ’ की एक लाक्षणिक स्थिति है। चराग़ रूपक है नेक और भले आदमी का, उसके सन्दर्भ से रोशनी रूपक है नेकी और भलाई का। इस तरह शे’र का अर्थ ये बनता है कि नेक आदमी किसी ख़ास जगह नेकी और भलाई फैलाने के लिए पैदा नहीं होते बल्कि उनका कोई विशेष मकान नहीं होता और ये स्थान की अवधारणा से बहुत आगे के लोग होते हैं। बस शर्त ये है कि आदमी भला हो। अगर ऐसा है तो भलाई हर जगह फैल जाती है।

Shafaq Sopori

jahan rahega wahin raushni luTaega

kisi charagh ka apna makan nahin hota

EXPLANATION #1

इस शे’र में कई अर्थ ऐसे हैं जिनसे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वसीम बरेलवी शे’र में अर्थ के साथ कैफ़ियत पैदा करने की कला से परिचित हैं। ‘जहाँ’ के सन्दर्भ से ‘वहीं’ और इन दोनों के सन्दर्भ से ‘मकाँ’, ‘चराग़’ के सन्दर्भ से ‘रौशनी’ और इससे बढ़कर ‘किसी’ ये सब ऐसे लक्षण हैं जिनसे शे’र में अर्थोत्पत्ति का तत्व पैदा हुआ है।

शे’र के शाब्दिक अर्थ तो ये हो सकते हैं कि चराग़ अपनी रौशनी से किसी एक मकाँ को रौशन नहीं करता है, बल्कि जहाँ जलता है वहाँ की फ़िज़ा को प्रज्वलित करता है। इस शे’र में एक शब्द 'मकाँ' केंद्र में है। मकाँ से यहाँ तात्पर्य मात्र कोई ख़ास घर नहीं बल्कि स्थान है।

अब आइए शे’र के भावार्थ पर प्रकाश डालते हैं। दरअसल शे’र में ‘चराग़’, ‘रौशनी’ और ‘मकाँ’ की एक लाक्षणिक स्थिति है। चराग़ रूपक है नेक और भले आदमी का, उसके सन्दर्भ से रोशनी रूपक है नेकी और भलाई का। इस तरह शे’र का अर्थ ये बनता है कि नेक आदमी किसी ख़ास जगह नेकी और भलाई फैलाने के लिए पैदा नहीं होते बल्कि उनका कोई विशेष मकान नहीं होता और ये स्थान की अवधारणा से बहुत आगे के लोग होते हैं। बस शर्त ये है कि आदमी भला हो। अगर ऐसा है तो भलाई हर जगह फैल जाती है।

Shafaq Sopori

vo jhuuT bol rahā thā baḌe salīqe se

maiñ e'tibār na kartā to aur kyā kartā

wo jhuT bol raha tha baDe saliqe se

main e'tibar na karta to aur kya karta

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raat to vaqt pāband hai Dhal jā.egī

dekhnā ye hai charāġhoñ safar kitnā hai

raat to waqt ki paband hai Dhal jaegi

dekhna ye hai charaghon ka safar kitna hai

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