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वसीम बरेलवी

1940 - | दिल्ली, भारत

लोकप्रिय शायर।

ऐसे रिश्ते का भरम रखना कोई खेल नहीं

तेरा होना भी नहीं और तिरा कहलाना भी

बहुत से ख़्वाब देखोगे तो आँखें

तुम्हारा साथ देना छोड़ देंगी

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भरे मकाँ का भी अपना नशा है क्या जाने

शराब-ख़ाने में रातें गुज़ारने वाला

हमारे घर का पता पूछने से क्या हासिल

उदासियों की कोई शहरियत नहीं होती

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जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा

किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता

जो मुझ में तुझ में चला रहा है बरसों से

कहीं हयात इसी फ़ासले का नाम हो

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क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता

आँसू की तरह आँख तक भी नहीं सकता

मैं जिन दिनों तिरे बारे में सोचता हूँ बहुत

उन्हीं दिनों तो ये दुनिया समझ में आती है

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मैं ने चाहा है तुझे आम से इंसाँ की तरह

तू मिरा ख़्वाब नहीं है जो बिखर जाएगा

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मैं उस को आँसुओं से लिख रहा हूँ

कि मेरे ब'अद कोई पढ़ पाए

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मोहब्बत में बिछड़ने का हुनर सब को नहीं आता

किसी को छोड़ना हो तो मुलाक़ातें बड़ी करना

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मुसलसल हादसों से बस मुझे इतनी शिकायत है

कि ये आँसू बहाने की भी तो मोहलत नहीं देते

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रात तो वक़्त की पाबंद है ढल जाएगी

देखना ये है चराग़ों का सफ़र कितना है

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शाम तक सुब्ह की नज़रों से उतर जाते हैं

इतने समझौतों पे जीते हैं कि मर जाते हैं

थके-हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें

सलीक़ा-मंद शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है

तिरे ख़याल के हाथों कुछ ऐसा बिखरा हूँ

कि जैसे बच्चा किताबें इधर उधर कर दे

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तुझे पाने की कोशिश में कुछ इतना खो चुका हूँ मैं

कि तू मिल भी अगर जाए तो अब मिलने का ग़म होगा

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वैसे तो इक आँसू ही बहा कर मुझे ले जाए

ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता

वो झूट बोल रहा था बड़े सलीक़े से

मैं ए'तिबार करता तो और क्या करता

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ये किस मक़ाम पे लाई है मेरी तन्हाई

कि मुझ से आज कोई बद-गुमाँ नहीं होता

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