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रद करें डाउनलोड शेर

संसद पर शेर

माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं

तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख

Interpretation: Rekhta AI

वक्ता अपनी अयोग्यता स्वीकार करके विनम्रता दिखाता है, पर अपनी सच्ची चाह और लगातार प्रतीक्षा को अपने पक्ष में रखता है। वह कहता है कि मिलने की पात्रता सही, मेरी लगन तो देखी जाए। यहाँ “दीद” केवल देखना नहीं, बल्कि निकटता और कृपा का संकेत है। भाव का केंद्र तड़प, भक्ति-सा समर्पण और आशा है।

अल्लामा इक़बाल

हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम

वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता

अकबर इलाहाबादी

तू इधर उधर की बात कर ये बता कि क़ाफ़िले क्यूँ लुटे

तिरी रहबरी का सवाल है हमें राहज़न से ग़रज़ नहीं

शहाब जाफ़री

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी

यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता

बशीर बद्र

तुम तकल्लुफ़ को भी इख़्लास समझते हो 'फ़राज़'

दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला

अहमद फ़राज़

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर मनुष्य की खत्म होने वाली चाहत और अतृप्ति को दिखाता है। “दम निकलना” एक रूपक है, जो बताता है कि इच्छा की तीव्रता इंसान को भीतर तक थका देती है। फिर भी, जब कई अरमान पूरे हो जाते हैं, तब भी संतोष नहीं मिलता, क्योंकि दिल की माँगें लगातार बढ़ती रहती हैं।

मिर्ज़ा ग़ालिब

ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने

लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद

जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

Interpretation: Rekhta AI

शायर अपनी ही नादानी पर व्यंग्य कर रहे हैं कि हम ऐसे इंसान से वफ़ा की उम्मीद लगाए बैठे हैं जो 'वफ़ा' शब्द के अर्थ से ही अनजान है। यह प्रेमी की लाचारी और प्रेम की विडंबना को दर्शाता है कि उनकी आशा एक ऐसे व्यक्ति से है जो उसे पूरा करने के योग्य ही नहीं।

मिर्ज़ा ग़ालिब

नशा पिला के गिराना तो सब को आता है

मज़ा तो जब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर आसान नुकसान पहुँचाने और मुश्किल मदद करने का फर्क दिखाता है। ‘नशा’ यहाँ किसी भी ऐसे लालच या असर का रूपक है जो इंसान को कमज़ोर कर दे, और ‘साक़ी’ उस व्यक्ति का प्रतीक है जिसके हाथ में देना या रोकना है। कवि कहता है गिराना तो आम है, असली महानता गिरते को सहारा देकर बचाने में है।

अल्लामा इक़बाल

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा

Interpretation: Rekhta AI

अल्लामा इक़बाल इस शेर में कहते हैं कि धर्म का संदेश आपसी नफरत नहीं है। वे याद दिलाते हैं कि हमारी सबसे बड़ी पहचान साझा देश है, इसलिए मिलकर सम्मान से रहना चाहिए। भाव-केन्द्र एकता, भाईचारे और सहिष्णुता की पुकार है।

अल्लामा इक़बाल

शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है

जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है

बशीर बद्र

शाम तक सुब्ह की नज़रों से उतर जाते हैं

इतने समझौतों पे जीते हैं कि मर जाते हैं

वसीम बरेलवी

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा

हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमारा

Interpretation: Rekhta AI

यह दोहा देश के प्रति प्रेम और गर्व की बात करता है और हिंदुस्तान को सबसे श्रेष्ठ बताता है। ‘बुलबुल’ और ‘गुलिस्तान’ के रूपक से देश को बाग और लोगों को उसकी मधुर आवाज़ वाले पंछी कहा गया है—देश उन्हें सहारा देता है और वे उसे रौनक देते हैं। भाव अपनापन, एकता और सामूहिक पहचान का है।

अल्लामा इक़बाल

तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था

उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था

हबीब जालिब

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो

सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो

निदा फ़ाज़ली

तुम्हारे पावँ के नीचे कोई ज़मीन नहीं

कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं

दुष्यंत कुमार

यक़ीन हो तो कोई रास्ता निकलता है

हवा की ओट भी ले कर चराग़ जलता है

मंज़ूर हाशमी

चेहरे पे सारे शहर के गर्द-ए-मलाल है

जो दिल का हाल है वही दिल्ली का हाल है

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

सच घटे या बढ़े तो सच रहे

झूट की कोई इंतिहा ही नहीं

कृष्ण बिहारी नूर

किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं

तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो

निदा फ़ाज़ली

तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है

मगर ये आँकड़े झूठे हैं ये दा'वा किताबी है

अदम गोंडवी

दोपहर तक बिक गया बाज़ार का हर एक झूट

और मैं इक सच को ले कर शाम तक बैठा रहा

अज्ञात

ज़िंदगी दी है तो जीने का हुनर भी देना

पाँव बख़्शें हैं तो तौफ़ीक़-ए-सफ़र भी देना

मेराज फ़ैज़ाबादी

ये कह कह के हम दिल को बहला रहे हैं

वो अब चल चुके हैं वो अब रहे हैं

जिगर मुरादाबादी
बोलिए