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वादा पर शेर

वादा अगर वफ़ा हो जाएगी

तो फिर वो वादा ही कहाँ। माशूक़ हमेशा वादा ख़िलाफ़ होता है, धोके बाज़ होता है। वो आशिक़ से वादा करता है लेकिन वफ़ा नहीं करता। ये वादे ही आशिक़ के जीने का बहाना होते हैं। हमारे इस इंतिख़ाब में वादा करने और उसे तोड़ने की दिल-चस्प सूरतों से आप गुज़़रेंगे।

तिरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना

कि ख़ुशी से मर जाते अगर ए'तिबार होता

मिर्ज़ा ग़ालिब

हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद

जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

Interpretation: Rekhta AI

शायर अपनी ही नादानी पर व्यंग्य कर रहे हैं कि हम ऐसे इंसान से वफ़ा की उम्मीद लगाए बैठे हैं जो 'वफ़ा' शब्द के अर्थ से ही अनजान है। यह प्रेमी की लाचारी और प्रेम की विडंबना को दर्शाता है कि उनकी आशा एक ऐसे व्यक्ति से है जो उसे पूरा करने के योग्य ही नहीं।

मिर्ज़ा ग़ालिब

वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे

तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर पुराने वादों को सामने रखकर आज की बेरुख़ी पर सवाल करता है। पहली पंक्ति में साथ निभाने और बात मानने की कसमें हैं, और दूसरी में तंज भरा याद दिलाना। भाव यह है कि जो वचन दिए गए थे, वही अब टूटते दिख रहे हैं, इसलिए याद को गवाही बनाया गया है।

दाग़ देहलवी

कोई वा'दा कोई यक़ीं कोई उमीद

मगर हमें तो तिरा इंतिज़ार करना था

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर प्रेम की मजबूरी और समर्पण को दिखाता है: सामने से वादा है, भरोसा, उम्मीद—फिर भी मन रुक नहीं पाता और प्रतीक्षा करता रहता है। पहली पंक्ति की बार-बार की “न” खालीपन और टूटती आशा को गहरा करती है, और दूसरी पंक्ति में “करना था” प्रतीक्षा को जैसे भाग्य बना देता है।

फ़िराक़ गोरखपुरी

तिरे वा'दों पे कहाँ तक मिरा दिल फ़रेब खाए

कोई ऐसा कर बहाना मिरी आस टूट जाए

फ़ना निज़ामी कानपुरी

आदतन तुम ने कर दिए वादे

आदतन हम ने ए'तिबार किया

गुलज़ार

ग़ज़ब किया तिरे वअ'दे पे ए'तिबार किया

तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर अपने ही भरोसे पर पछतावा और आत्म-तिरस्कार दिखाता है। वादा पूरा होने से इंतज़ार इतना भारी और लंबा लगता है कि उसे “क़यामत” जैसा कहा गया है। यहाँ क़यामत अंत-काल नहीं, बल्कि मन की घबराहट, टूटन और निराशा का रूपक है।

दाग़ देहलवी

तेरी मजबूरियाँ दुरुस्त मगर

तू ने वादा किया था याद तो कर

नासिर काज़मी

वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि याद हो

वही यानी वादा निबाह का तुम्हें याद हो कि याद हो

Interpretation: Rekhta AI

कवि प्रिय से पूछता है कि क्या उसे वह पुराना रिश्ता और आपसी समझ अब भी याद है। “क़रार” यहाँ स्थिरता और तय हुए संबंध का संकेत है, और “वादा निभाह” निष्ठा से साथ देने की प्रतिज्ञा है। “याद हो कि याद हो” की बार-बार ध्वनि में शिकायत भी है और टूटन भी—जैसे भूल जाना ही बेवफ़ाई हो। यह शेर प्रेम को याद और वफ़ादारी की कसौटी पर रखता है।

मोमिन ख़ाँ मोमिन

क्यूँ पशेमाँ हो अगर वअ'दा वफ़ा हो सका

कहीं वादे भी निभाने के लिए होते हैं

इबरत मछलीशहरी

अब तुम कभी आओगे यानी कभी कभी

रुख़्सत करो मुझे कोई वादा किए बग़ैर

जौन एलिया

एक इक बात में सच्चाई है उस की लेकिन

अपने वादों से मुकर जाने को जी चाहता है

कफ़ील आज़र अमरोहवी

दिन गुज़ारा था बड़ी मुश्किल से

फिर तिरा वादा-ए-शब याद आया

नासिर काज़मी

ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया

झूटी क़सम से आप का ईमान तो गया

Interpretation: Rekhta AI

कहने वाला बताता है कि उसने बात सच मानकर नहीं, बल्कि आदर और लिहाज़ में स्वीकार कर ली। सामने वाला अपनी बात पक्की करने के लिए क़सम खाता है, पर वह क़सम झूठी निकलती है। इससे बात तो मनवा ली जाती है, लेकिन चरित्र और भरोसे की बुनियाद टूट जाती है। यहाँ “ईमान” का अर्थ सच्चाई और नैतिक भरोसे से है।

दाग़ देहलवी

सुबूत है ये मोहब्बत की सादा-लौही का

जब उस ने वादा किया हम ने ए'तिबार किया

जोश मलीहाबादी

साफ़ इंकार अगर हो तो तसल्ली हो जाए

झूटे वादों से तिरे रंज सिवा होता है

क़ैसर हैदरी देहलवी

एक मुद्दत से क़ासिद है ख़त है पयाम

अपने वा'दे को तो कर याद मुझे याद कर

जलाल मानकपुरी

उम्मीद तो बंध जाती तस्कीन तो हो जाती

वा'दा वफ़ा करते वा'दा तो किया होता

चराग़ हसन हसरत

वो उम्मीद क्या जिस की हो इंतिहा

वो व'अदा नहीं जो वफ़ा हो गया

अल्ताफ़ हुसैन हाली

तेरे वादे को कभी झूट नहीं समझूँगा

आज की रात भी दरवाज़ा खुला रक्खूँगा

शहरयार

किस मुँह से कह रहे हो हमें कुछ ग़रज़ नहीं

किस मुँह से तुम ने व'अदा किया था निबाह का

हफ़ीज़ जालंधरी

फिर बैठे बैठे वादा-ए-वस्ल उस ने कर लिया

फिर उठ खड़ा हुआ वही रोग इंतिज़ार का

अमीर मीनाई

मैं भी हैरान हूँ 'दाग़' कि ये बात है क्या

वादा वो करते हैं आता है तबस्सुम मुझ को

Interpretation: Rekhta AI

कवि अपने ही मन की हालत पर अचरज करता है कि प्रिय के वादे सुनकर अब उम्मीद नहीं जगती, बल्कि हल्की-सी मुस्कान जाती है। यहाँ “वादा” बार-बार किए गए और निभाए गए आश्वासनों का संकेत है। भाव में थकान, संदेह और थोड़ी विडंबना है—जैसे वादा अब गंभीर बात नहीं रहा।

दाग़ देहलवी

मैं उस के वादे का अब भी यक़ीन करता हूँ

हज़ार बार जिसे आज़मा लिया मैं ने

मख़मूर सईदी

था व'अदा शाम का मगर आए वो रात को

मैं भी किवाड़ खोलने फ़ौरन नहीं गया

अनवर शऊर

वादा नहीं पयाम नहीं गुफ़्तुगू नहीं

हैरत है ख़ुदा मुझे क्यूँ इंतिज़ार है

लाला माधव राम जौहर

और कुछ देर सितारो ठहरो

उस का व'अदा है ज़रूर आएगा

एहसान दानिश कांधलवी

फिर चाहे तो आना आन बान वाले

झूटा ही वअ'दा कर ले सच्ची ज़बान वाले

आरज़ू लखनवी

आप तो मुँह फेर कर कहते हैं आने के लिए

वस्ल का वादा ज़रा आँखें मिला कर कीजिए

लाला माधव राम जौहर

बरसों हुए तुम ने किया भूल कर भी याद

वादे की तरह हम भी फ़रामोश हो गए

जलील मानिकपूरी

जो तुम्हारी तरह तुम से कोई झूटे वादे करता

तुम्हीं मुंसिफ़ी से कह दो तुम्हें ए'तिबार होता

Interpretation: Rekhta AI

वक्ता प्रेमी/प्रेमिका को उसी की बात वापस लौटा देता है और कहता है कि जो झूठे वादे तुम करते हो, वही कोई तुम्हारे साथ करे तो कैसा लगेगा। यहाँ ‘न्याय’ की बात करके वह पाखंड दिखाता है और बराबरी का हिसाब माँगता है। भावनात्मक केंद्र टूटता हुआ विश्वास और शिकायत है। शेर का असर इसी उलटे सवाल में है।

दाग़ देहलवी

आप ने झूटा व'अदा कर के

आज हमारी उम्र बढ़ा दी

कैफ़ भोपाली

उस के वादों से इतना तो साबित हुआ उस को थोड़ा सा पास-ए-तअल्लुक़ तो है

ये अलग बात है वो है वादा-शिकन ये भी कुछ कम नहीं उस ने वादे किए

आमिर उस्मानी

वो फिर वादा मिलने का करते हैं यानी

अभी कुछ दिनों हम को जीना पड़ेगा

आसी ग़ाज़ीपुरी

झूटे वादे भी नहीं करते आप

कोई जीने का सहारा ही नहीं

जलील मानिकपूरी

भूलने वाले को शायद याद वादा गया

मुझ को देखा मुस्कुराया ख़ुद-ब-ख़ुद शरमा गया

असर लखनवी

दिल कभी लाख ख़ुशामद पे भी राज़ी हुआ

कभी इक झूटे ही वादे पे बहलते देखा

जलील मानिकपूरी

झूटे वादों पर थी अपनी ज़िंदगी

अब तो वो भी आसरा जाता रहा

मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी

सवाल-ए-वस्ल पर कुछ सोच कर उस ने कहा मुझ से

अभी वादा तो कर सकते नहीं हैं हम मगर देखो

बेख़ुद देहलवी

वो और वा'दा वस्ल का क़ासिद नहीं नहीं

सच सच बता ये लफ़्ज़ उन्ही की ज़बाँ के हैं

मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा

मान लेता हूँ तेरे वादे को

भूल जाता हूँ मैं कि तू है वही

जलील मानिकपूरी

साफ़ कह दीजिए वादा ही किया था किस ने

उज़्र क्या चाहिए झूटों के मुकरने के लिए

Interpretation: Rekhta AI

कवि सीधे सवाल करके सामने वाले को जवाबदेह बनाता है और संकेत देता है कि शायद कभी सच्चा वादा हुआ ही नहीं। दूसरी पंक्ति में तंज है कि झूठ बोलने वाले को पलट जाने के लिए किसी कारण की ज़रूरत नहीं पड़ती, वह आसानी से इंकार कर देता है। “बहाना” यहाँ ढाल है और “मुकरना” बेईमानी का रूपक। भाव में चोट, नाराज़गी और कड़वी सच्चाई है।

दाग़ देहलवी

तुझ को देखा तिरे वादे देखे

ऊँची दीवार के लम्बे साए

बाक़ी सिद्दीक़ी

वादा झूटा कर लिया चलिए तसल्ली हो गई

है ज़रा सी बात ख़ुश करना दिल-ए-नाशाद का

Interpretation: Rekhta AI

कवि कहता है कि दिल को सहारा देने के लिए सच भी जरूरी नहीं; झूठा वादा भी कुछ देर की राहत दे देता है। “दिल-ए-नाशाद” उस टूटे और मायूस मन का संकेत है जो थोड़े से अपनापन से संभल जाता है। हल्की-सी बात में छिपा दर्द यह है कि उसे खुशी के लिए भी उधार की उम्मीद चाहिए।

दाग़ देहलवी

इन वफ़ादारी के वादों को इलाही क्या हुआ

वो वफ़ाएँ करने वाले बेवफ़ा क्यूँ हो गए

अख़्तर शीरानी

वादा वो कर रहे हैं ज़रा लुत्फ़ देखिए

वादा ये कह रहा है करना वफ़ा मुझे

जलील मानिकपूरी

बाज़ वादे किए नहीं जाते

फिर भी उन को निभाया जाता है

अंजुम ख़याली

मुझे है ए'तिबार-ए-वादा लेकिन

तुम्हें ख़ुद ए'तिबार आए आए

अख़्तर शीरानी

बस एक बार ही तोड़ा जहाँ ने अहद-ए-वफ़ा

किसी से हम ने फिर अहद-ए-वफ़ा किया ही नहीं

इब्राहीम अश्क

कम-सिनी में तो हसीं अहद-ए-वफ़ा करते हैं

भूल जाते हैं मगर सब जो शबाब आता है

अनुराज़
बोलिए