वादा पर शेर
वादा अगर वफ़ा हो जाएगी
तो फिर वो वादा ही कहाँ। माशूक़ हमेशा वादा ख़िलाफ़ होता है, धोके बाज़ होता है। वो आशिक़ से वादा करता है लेकिन वफ़ा नहीं करता। ये वादे ही आशिक़ के जीने का बहाना होते हैं। हमारे इस इंतिख़ाब में वादा करने और उसे तोड़ने की दिल-चस्प सूरतों से आप गुज़़रेंगे।
तिरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ए'तिबार होता
हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
Interpretation:
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शायर अपनी ही नादानी पर व्यंग्य कर रहे हैं कि हम ऐसे इंसान से वफ़ा की उम्मीद लगाए बैठे हैं जो 'वफ़ा' शब्द के अर्थ से ही अनजान है। यह प्रेमी की लाचारी और प्रेम की विडंबना को दर्शाता है कि उनकी आशा एक ऐसे व्यक्ति से है जो उसे पूरा करने के योग्य ही नहीं।
वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था
Interpretation:
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यह शेर पुराने वादों को सामने रखकर आज की बेरुख़ी पर सवाल करता है। पहली पंक्ति में साथ निभाने और बात मानने की कसमें हैं, और दूसरी में तंज भरा याद दिलाना। भाव यह है कि जो वचन दिए गए थे, वही अब टूटते दिख रहे हैं, इसलिए याद को गवाही बनाया गया है।
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न कोई वा'दा न कोई यक़ीं न कोई उमीद
मगर हमें तो तिरा इंतिज़ार करना था
Interpretation:
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यह शेर प्रेम की मजबूरी और समर्पण को दिखाता है: सामने से न वादा है, न भरोसा, न उम्मीद—फिर भी मन रुक नहीं पाता और प्रतीक्षा करता रहता है। पहली पंक्ति की बार-बार की “न” खालीपन और टूटती आशा को गहरा करती है, और दूसरी पंक्ति में “करना था” प्रतीक्षा को जैसे भाग्य बना देता है।
तिरे वा'दों पे कहाँ तक मिरा दिल फ़रेब खाए
कोई ऐसा कर बहाना मिरी आस टूट जाए
ग़ज़ब किया तिरे वअ'दे पे ए'तिबार किया
तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया
Interpretation:
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यह शेर अपने ही भरोसे पर पछतावा और आत्म-तिरस्कार दिखाता है। वादा पूरा न होने से इंतज़ार इतना भारी और लंबा लगता है कि उसे “क़यामत” जैसा कहा गया है। यहाँ क़यामत अंत-काल नहीं, बल्कि मन की घबराहट, टूटन और निराशा का रूपक है।
तेरी मजबूरियाँ दुरुस्त मगर
तू ने वादा किया था याद तो कर
वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो
वही यानी वादा निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो
Interpretation:
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कवि प्रिय से पूछता है कि क्या उसे वह पुराना रिश्ता और आपसी समझ अब भी याद है। “क़रार” यहाँ स्थिरता और तय हुए संबंध का संकेत है, और “वादा निभाह” निष्ठा से साथ देने की प्रतिज्ञा है। “याद हो कि न याद हो” की बार-बार ध्वनि में शिकायत भी है और टूटन भी—जैसे भूल जाना ही बेवफ़ाई हो। यह शेर प्रेम को याद और वफ़ादारी की कसौटी पर रखता है।
क्यूँ पशेमाँ हो अगर वअ'दा वफ़ा हो न सका
कहीं वादे भी निभाने के लिए होते हैं
अब तुम कभी न आओगे यानी कभी कभी
रुख़्सत करो मुझे कोई वादा किए बग़ैर
एक इक बात में सच्चाई है उस की लेकिन
अपने वादों से मुकर जाने को जी चाहता है
दिन गुज़ारा था बड़ी मुश्किल से
फिर तिरा वादा-ए-शब याद आया
ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया
झूटी क़सम से आप का ईमान तो गया
Interpretation:
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कहने वाला बताता है कि उसने बात सच मानकर नहीं, बल्कि आदर और लिहाज़ में स्वीकार कर ली। सामने वाला अपनी बात पक्की करने के लिए क़सम खाता है, पर वह क़सम झूठी निकलती है। इससे बात तो मनवा ली जाती है, लेकिन चरित्र और भरोसे की बुनियाद टूट जाती है। यहाँ “ईमान” का अर्थ सच्चाई और नैतिक भरोसे से है।
सुबूत है ये मोहब्बत की सादा-लौही का
जब उस ने वादा किया हम ने ए'तिबार किया
साफ़ इंकार अगर हो तो तसल्ली हो जाए
झूटे वादों से तिरे रंज सिवा होता है
एक मुद्दत से न क़ासिद है न ख़त है न पयाम
अपने वा'दे को तो कर याद मुझे याद न कर
उम्मीद तो बंध जाती तस्कीन तो हो जाती
वा'दा न वफ़ा करते वा'दा तो किया होता
वो उम्मीद क्या जिस की हो इंतिहा
वो व'अदा नहीं जो वफ़ा हो गया
तेरे वादे को कभी झूट नहीं समझूँगा
आज की रात भी दरवाज़ा खुला रक्खूँगा
किस मुँह से कह रहे हो हमें कुछ ग़रज़ नहीं
किस मुँह से तुम ने व'अदा किया था निबाह का
फिर बैठे बैठे वादा-ए-वस्ल उस ने कर लिया
फिर उठ खड़ा हुआ वही रोग इंतिज़ार का
मैं भी हैरान हूँ ऐ 'दाग़' कि ये बात है क्या
वादा वो करते हैं आता है तबस्सुम मुझ को
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कवि अपने ही मन की हालत पर अचरज करता है कि प्रिय के वादे सुनकर अब उम्मीद नहीं जगती, बल्कि हल्की-सी मुस्कान आ जाती है। यहाँ “वादा” बार-बार किए गए और निभाए न गए आश्वासनों का संकेत है। भाव में थकान, संदेह और थोड़ी विडंबना है—जैसे वादा अब गंभीर बात नहीं रहा।
मैं उस के वादे का अब भी यक़ीन करता हूँ
हज़ार बार जिसे आज़मा लिया मैं ने
था व'अदा शाम का मगर आए वो रात को
मैं भी किवाड़ खोलने फ़ौरन नहीं गया
वादा नहीं पयाम नहीं गुफ़्तुगू नहीं
हैरत है ऐ ख़ुदा मुझे क्यूँ इंतिज़ार है
और कुछ देर सितारो ठहरो
उस का व'अदा है ज़रूर आएगा
आप तो मुँह फेर कर कहते हैं आने के लिए
वस्ल का वादा ज़रा आँखें मिला कर कीजिए
बरसों हुए न तुम ने किया भूल कर भी याद
वादे की तरह हम भी फ़रामोश हो गए
जो तुम्हारी तरह तुम से कोई झूटे वादे करता
तुम्हीं मुंसिफ़ी से कह दो तुम्हें ए'तिबार होता
Interpretation:
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वक्ता प्रेमी/प्रेमिका को उसी की बात वापस लौटा देता है और कहता है कि जो झूठे वादे तुम करते हो, वही कोई तुम्हारे साथ करे तो कैसा लगेगा। यहाँ ‘न्याय’ की बात करके वह पाखंड दिखाता है और बराबरी का हिसाब माँगता है। भावनात्मक केंद्र टूटता हुआ विश्वास और शिकायत है। शेर का असर इसी उलटे सवाल में है।
आप ने झूटा व'अदा कर के
आज हमारी उम्र बढ़ा दी
उस के वादों से इतना तो साबित हुआ उस को थोड़ा सा पास-ए-तअल्लुक़ तो है
ये अलग बात है वो है वादा-शिकन ये भी कुछ कम नहीं उस ने वादे किए
वो फिर वादा मिलने का करते हैं यानी
अभी कुछ दिनों हम को जीना पड़ेगा
झूटे वादे भी नहीं करते आप
कोई जीने का सहारा ही नहीं
दिल कभी लाख ख़ुशामद पे भी राज़ी न हुआ
कभी इक झूटे ही वादे पे बहलते देखा
सवाल-ए-वस्ल पर कुछ सोच कर उस ने कहा मुझ से
अभी वादा तो कर सकते नहीं हैं हम मगर देखो
वो और वा'दा वस्ल का क़ासिद नहीं नहीं
सच सच बता ये लफ़्ज़ उन्ही की ज़बाँ के हैं
मान लेता हूँ तेरे वादे को
भूल जाता हूँ मैं कि तू है वही
साफ़ कह दीजिए वादा ही किया था किस ने
उज़्र क्या चाहिए झूटों के मुकरने के लिए
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कवि सीधे सवाल करके सामने वाले को जवाबदेह बनाता है और संकेत देता है कि शायद कभी सच्चा वादा हुआ ही नहीं। दूसरी पंक्ति में तंज है कि झूठ बोलने वाले को पलट जाने के लिए किसी कारण की ज़रूरत नहीं पड़ती, वह आसानी से इंकार कर देता है। “बहाना” यहाँ ढाल है और “मुकरना” बेईमानी का रूपक। भाव में चोट, नाराज़गी और कड़वी सच्चाई है।
तुझ को देखा तिरे वादे देखे
ऊँची दीवार के लम्बे साए
वादा झूटा कर लिया चलिए तसल्ली हो गई
है ज़रा सी बात ख़ुश करना दिल-ए-नाशाद का
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कवि कहता है कि दिल को सहारा देने के लिए सच भी जरूरी नहीं; झूठा वादा भी कुछ देर की राहत दे देता है। “दिल-ए-नाशाद” उस टूटे और मायूस मन का संकेत है जो थोड़े से अपनापन से संभल जाता है। हल्की-सी बात में छिपा दर्द यह है कि उसे खुशी के लिए भी उधार की उम्मीद चाहिए।
इन वफ़ादारी के वादों को इलाही क्या हुआ
वो वफ़ाएँ करने वाले बेवफ़ा क्यूँ हो गए
वादा वो कर रहे हैं ज़रा लुत्फ़ देखिए
वादा ये कह रहा है न करना वफ़ा मुझे
बाज़ वादे किए नहीं जाते
फिर भी उन को निभाया जाता है
मुझे है ए'तिबार-ए-वादा लेकिन
तुम्हें ख़ुद ए'तिबार आए न आए
बस एक बार ही तोड़ा जहाँ ने अहद-ए-वफ़ा
किसी से हम ने फिर अहद-ए-वफ़ा किया ही नहीं