ज़ुहूर नज़र

ग़ज़ल 15

शेर 12

सुनते हैं चमकता है वो चाँद अब भी सर-ए-बाम

हसरत है कि बस एक नज़र देख लें हम भी

वो भी शायद रो पड़े वीरान काग़ज़ देख कर

मैं ने उस को आख़िरी ख़त में लिखा कुछ भी नहीं

सो सका हूँ शब जाग कर गुज़ारी है

अजीब दिन हैं सुकूँ है बे-क़रारी है

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वो जिसे सारे ज़माने ने कहा मेरा रक़ीब

मैं ने उस को हम-सफ़र जाना कि तू उस की भी थी

पास हमारे आकर तुम बेगाना से क्यूँ हो

चाहो तो हम फिर कुछ दूरी पर छोड़ आएँ तुम्हें

पुस्तकें 1

Kulliyat-e-Zuhoor Nazar

 

1987

 

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