ज़ाइशा उस्मान
ग़ज़ल 10
अशआर 13
कैसा ये मरहला है कि इक दूसरे से हम
कहने को आश्ना हैं मगर आश्ना नहीं
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere