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नज़्म
ख़ून फिर ख़ून है
ज़ुल्म की क़िस्मत-ए-नाकारा-ओ-रुस्वा से कहो
जब्र की हिकमत-ए-परकार के ईमा से कहो
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
अब तो उस सूने माथे पर कोरे-पन की चादर है
अम्मा जी की सारी सज-धज सब ज़ेवर थे बाबू जी
आलोक श्रीवास्तव
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नज़्म
कौन सी उलझन को सुलझाते हैं हम?
ये समझ कर जुरआ-ए-पिन्हाँ कोई
शायद आख़िर इब्तिदा-ए-राज़ का ईमा बने!
नून मीम राशिद
नज़्म
मुझे जाना है इक दिन
कोई दम में हयात-ए-नौ का फिर परचम उठाता हूँ
ब-ईमा-ए-हमिय्यत जान की बाज़ी लगाता हूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
क़यामत है कि सुन लैला का दश्त-ए-क़ैस में आना
त'अज्जुब से वो बोला यूँ भी होता है ज़माने में
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
नाज़ ओ अदा ओ ग़म्ज़ा निगह पंजा-ए-मिज़ा
मारें हैं एक दिल को ये पिल पिल के चार पाँच














