यही है आज़माना तो सताना किस को कहते हैं
अदू के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तिहाँ क्यूँ हो
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कवि कहता है कि प्रिय परख के नाम पर उसे बेवजह कष्ट दे रही है। जब वह पहले ही विरोधी पक्ष चुन चुकी है, तब भी प्रेम का सबूत माँगना ताना और अन्याय बन जाता है। भाव में चोट खाया स्वाभिमान, कसक और तीखा व्यंग्य है।
जिस ज़ख़्म की हो सकती हो तदबीर रफ़ू की
लिख दीजियो या रब उसे क़िस्मत में अदू की
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ग़ालिब का कहना है कि जो घाव भर सकते हैं, वे साधारण हैं और दुश्मन के ही लायक हैं। शायर ख़ुद को ऐसे लाइलाज ग़म का हक़दार मानता है जो ताउम्र ताज़ा रहे, क्योंकि यही सच्चे इश्क़ की निशानी है।
अदू को छोड़ दो फिर जान भी माँगो तो हाज़िर है
तुम ऐसा कर नहीं सकते तो ऐसा हो नहीं सकता
मैं जिस को अपनी गवाही में ले के आया हूँ
अजब नहीं कि वही आदमी अदू का भी हो
गो आप ने जवाब बुरा ही दिया वले
मुझ से बयाँ न कीजे अदू के पयाम को
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वक्ता प्रिय की कड़वी बात को भी सहने को तैयार है, पर अपनी मर्यादा की सीमा तय करता है कि प्रतिद्वन्द्वी की बात उसके सामने न दोहराई जाए। यहाँ “दुश्मन” से आशय प्रेम का प्रतिद्वन्द्वी भी है, और उसका “संदेश” सुनना अपमान जैसा लगता है। भाव यह है कि प्रिय से मिला दुःख चल जाता है, पर प्रतिद्वन्द्वी के माध्यम से तिरस्कार नहीं।
याँ तक अदू का पास है उन को कि बज़्म में
वो बैठते भी हैं तो मिरे हम-नशीं से दूर
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शेर में प्रेमी का दुख है कि प्रिय व्यक्ति दुश्मन/प्रतिद्वंद्वी की परवाह में इतना बंधा है कि महफ़िल में भी पास नहीं आता। बैठने का दृश्य दूरी का प्रतीक बन जाता है—सामने होते हुए भी अपनापन नहीं। यहाँ सामाजिक दबाव और प्रतिद्वंद्विता के बीच प्रेम की हार दिखाई देती है। दर्द यह है कि प्रेमी को सार्वजनिक तौर पर अलग कर दिया जाता है।
सहल हो गरचे अदू को मगर उस का मिलना
इतना मैं ख़ूब समझता हूँ कि आसाँ तो नहीं
मेरे दुश्मन तो पूछ सकते हैं
दोस्तो तुम मिज़ाज मत पूछो
अव्वल अहल-ए-क़बीला ने परचम बनाया उसे और फिर
पेश-ए-दुश्मन भी तावान में सिर्फ़ मेरी रिदा ले गए
मुझ पर ब-तौर-ए-ख़ास थी उस की निगाह-ए-लुत्फ़
कहता मैं किस तरह मिरे दुश्मन में कुछ न था
मैं आप अपनी मुख़ालिफ़ थी अपनी दुश्मन थी
मुझे ही मुझ से ये अच्छा किया जुदा कर के
तुम तो सुन पाए न आवाज़-ए-शिकस्त-ए-दिल भी
कुछ हमीं थे कि हरीफ़-ए-ग़म-ए-दुनिया भी हुए