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रद करें डाउनलोड शेर

अदू पर शेर

यही है आज़माना तो सताना किस को कहते हैं

अदू के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तिहाँ क्यूँ हो

Interpretation: Rekhta AI

कवि कहता है कि प्रिय परख के नाम पर उसे बेवजह कष्ट दे रही है। जब वह पहले ही विरोधी पक्ष चुन चुकी है, तब भी प्रेम का सबूत माँगना ताना और अन्याय बन जाता है। भाव में चोट खाया स्वाभिमान, कसक और तीखा व्यंग्य है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

जिस ज़ख़्म की हो सकती हो तदबीर रफ़ू की

लिख दीजियो या रब उसे क़िस्मत में अदू की

Interpretation: Rekhta AI

ग़ालिब का कहना है कि जो घाव भर सकते हैं, वे साधारण हैं और दुश्मन के ही लायक हैं। शायर ख़ुद को ऐसे लाइलाज ग़म का हक़दार मानता है जो ताउम्र ताज़ा रहे, क्योंकि यही सच्चे इश्क़ की निशानी है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

अदू को छोड़ दो फिर जान भी माँगो तो हाज़िर है

तुम ऐसा कर नहीं सकते तो ऐसा हो नहीं सकता

मुज़्तर ख़ैराबादी

मैं जिस को अपनी गवाही में ले के आया हूँ

अजब नहीं कि वही आदमी अदू का भी हो

इफ़्तिख़ार आरिफ़

गो आप ने जवाब बुरा ही दिया वले

मुझ से बयाँ कीजे अदू के पयाम को

Interpretation: Rekhta AI

वक्ता प्रिय की कड़वी बात को भी सहने को तैयार है, पर अपनी मर्यादा की सीमा तय करता है कि प्रतिद्वन्द्वी की बात उसके सामने दोहराई जाए। यहाँ “दुश्मन” से आशय प्रेम का प्रतिद्वन्द्वी भी है, और उसका “संदेश” सुनना अपमान जैसा लगता है। भाव यह है कि प्रिय से मिला दुःख चल जाता है, पर प्रतिद्वन्द्वी के माध्यम से तिरस्कार नहीं।

मोमिन ख़ाँ मोमिन

याँ तक अदू का पास है उन को कि बज़्म में

वो बैठते भी हैं तो मिरे हम-नशीं से दूर

Interpretation: Rekhta AI

शेर में प्रेमी का दुख है कि प्रिय व्यक्ति दुश्मन/प्रतिद्वंद्वी की परवाह में इतना बंधा है कि महफ़िल में भी पास नहीं आता। बैठने का दृश्य दूरी का प्रतीक बन जाता है—सामने होते हुए भी अपनापन नहीं। यहाँ सामाजिक दबाव और प्रतिद्वंद्विता के बीच प्रेम की हार दिखाई देती है। दर्द यह है कि प्रेमी को सार्वजनिक तौर पर अलग कर दिया जाता है।

बहादुर शाह ज़फ़र

सहल हो गरचे अदू को मगर उस का मिलना

इतना मैं ख़ूब समझता हूँ कि आसाँ तो नहीं

मीर मेहदी मजरूह

मेरे दुश्मन तो पूछ सकते हैं

दोस्तो तुम मिज़ाज मत पूछो

माहिर चांदपुरी

अव्वल अहल-ए-क़बीला ने परचम बनाया उसे और फिर

पेश-ए-दुश्मन भी तावान में सिर्फ़ मेरी रिदा ले गए

इशरत आफ़रीं

मुझ पर ब-तौर-ए-ख़ास थी उस की निगाह-ए-लुत्फ़

कहता मैं किस तरह मिरे दुश्मन में कुछ था

फ़ाज़िल अंसारी

मैं आप अपनी मुख़ालिफ़ थी अपनी दुश्मन थी

मुझे ही मुझ से ये अच्छा किया जुदा कर के

सुग़रा सदफ़

तुम तो सुन पाए आवाज़-ए-शिकस्त-ए-दिल भी

कुछ हमीं थे कि हरीफ़-ए-ग़म-ए-दुनिया भी हुए

सज्जाद बाक़र रिज़वी
बोलिए