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हिंदुस्तान पर शेर

सर-ज़मीन-ए-हिंद पर अक़्वाम-ए-आलम के 'फ़िराक़'

क़ाफ़िले बसते गए हिन्दोस्ताँ बनता गया

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर भारत को ऐसी भूमि बताता है जहाँ अलग-अलग समुदाय आते रहे और यहीं के होकर रह गए। “क़ाफ़िले” लगातार आने-जाने और बसने की धाराओं का संकेत हैं। भाव यह है कि अनेकता के साथ रहने और मिलकर बसने से ही हिंदुस्तान की साझा पहचान धीरे-धीरे बनी।

फ़िराक़ गोरखपुरी

क्या पूछते हो नाम-ओ-निशान-ए-मुसाफ़िराँ

हिन्दोस्ताँ में आए हैं हिन्दोस्तान के थे

जौन एलिया

इलाही एक दिल किस किस को दूँ मैं

हज़ारों बुत हैं याँ हिन्दोस्तान है

हैदर अली आतिश

जो ये हिन्दोस्ताँ नहीं होता

तो ये उर्दू ज़बाँ नहीं होती

अब्दुल सलाम बंगलौरी

जज़्बात भी हिन्दू होते हैं चाहत भी मुसलमाँ होती है

दुनिया का इशारा था लेकिन समझा इशारा, दिल ही तो है

साहिर लुधियानवी
बोलिए