मुझ से क़फ़स का दरवाज़ा क्या टूटेगा
पाँव पड़ी ज़ंजीर में खोई रहती हूँ
ख़त-ओ-काकुल-ओ-ज़ुल्फ़-ओ-अंदाज़-ओ-नाज़
हुईं दाम-ए-रह सद-गिरफ़्तारियाँ
उसके चेहरे की बारीक लकीरें, माथे की लटें, लंबे बाल, ढंग और नखरे—सब मोह लेने वाले थे।
ये सब रास्ते में फंदे बन गए और सैकड़ों बार लोग पकड़े गए।
मीर तक़ी मीर यहाँ महबूब की खूबसूरती और चाल-ढाल को अलग-अलग फंदों की तरह गिनाते हैं। “रास्ते के जाल” का मतलब है कि जहाँ भी प्रेमी जाए, आकर्षण सामने आकर बाँध लेता है। भाव यह है कि दिल अपनी मर्ज़ी से नहीं, उस नज़ाकत और नखरे की ताक़त से बार-बार क़ैद हो जाता है। प्रेम को यहाँ गिरफ्तारी के रूपक में रखा गया है।
कह रहे हैं वो बना कर ज़ुल्फ़ को
मुजरिमान-ए-इश्क़ की ज़ंजीर देख
क़फ़स में रह के न रोते अगर ये जानते हम
चमन में रह के भी रोना है बाल-ओ-पर के लिए
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टैग्ज़ : गिर्या-ओ-ज़ारीऔर 1 अन्य
क़ैद-ए-आवारगी-ए-जाँ ही बहुत है मुझ को
एक दीवार मिरी रूह के अंदर न बना
शजर की याद रुलाती ही थी मगर अब तो
जो आशियाँ के बराबर था वो क़फ़स भी गया
छेड़ती है मुझे आ आ के मिरी आज़ादी
गो मैं क़ैदी हूँ मिरे पाँव में ज़ंजीर भी है
रोज़ ज़िंदान की दीवार पे लिखता है कोई
हाए तन्हाई सलासिल से कहीं भारी है
ज़िंदगानी असीर करने को
गेसुओं का ये जाल अच्छा है
गाह हो जाता हूँ मैं अपनी अना का क़ैदी
मैं न आऊँ तो फिर आ कर मुझे छुड़वाएगा
खींचते हो हर जानिब किस लिए लकीरें सी
मैं न कोई रावन हूँ मैं न कोई सीता हूँ
हम तो बैठे ही रहे अपनी असीरी को लिए
बनने वाला काम बे-वहम-ओ-गुमाँ बनता गया