मेरी हर शब इसी उम्मीद में कट जाती है
वो अभी आया अभी मेरा मुक़द्दर जागा
दम मोहब्बत का भरा करता था जो दिल वस्ल में
अब वो शाम-ए-हिज्र आते ही पशेमाँ हो गया
वादा-ए-वस्ल न होता तो हम ऐसे भी न थे
कि हमें हिज्र में मरना न गवारा होता
वस्ल का लुत्फ़ शब-ए-हिज्र के मारे यूँ लें
नींद आ जाए जो दोनों को तो ख़्वाबों में मिलें
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टैग्ज़ : तंज़-ओ-मिज़ाहऔर 1 अन्य