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ग़म की शायरी

ग़म-ए-ज़िंदगी हो नाराज़

मुझ को आदत है मुस्कुराने की

अब्दुल हमीद अदम

ग़म और होता सुन के गर आते वो 'वसीम'

अच्छा है मेरे हाल की उन को ख़बर नहीं

वसीम बरेलवी

ग़म अगरचे जाँ-गुसिल है कहाँ बचें कि दिल है

ग़म-ए-इश्क़ गर होता ग़म-ए-रोज़गार होता

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में ग़ालिब कहते हैं कि दिल होना ही दुख की संभावना है, इसलिए दुख से बचना मुश्किल है। वे प्रेम के दुख को सांसारिक चिंताओं के दुख से तुलना करके दिखाते हैं। प्रेम का दुख तीखा है, पर उसमें एक तरह की गरिमा और अर्थ है; वरना आदमी बस रोज़मर्रा की परेशानियों में घिसता रहता। मतलब यह कि दुख टलता नहीं, बस उसका रूप बदल जाता है।

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में ग़ालिब कहते हैं कि दिल होना ही दुख की संभावना है, इसलिए दुख से बचना मुश्किल है। वे प्रेम के दुख को सांसारिक चिंताओं के दुख से तुलना करके दिखाते हैं। प्रेम का दुख तीखा है, पर उसमें एक तरह की गरिमा और अर्थ है; वरना आदमी बस रोज़मर्रा की परेशानियों में घिसता रहता। मतलब यह कि दुख टलता नहीं, बस उसका रूप बदल जाता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

ग़म बहुत दिन मुफ़्त की खाता रहा

अब उसे दिल से निकाला चाहिए

मोहम्मद अल्वी

ग़म अपने ही अश्कों का ख़रीदा हुआ है

दिल अपनी ही हालत का तमाशाई है देखो

ज़ेहरा निगाह

आज भी शाम-ए-ग़म! उदास हो

माँग कर मैं चराग़ लाता हूँ

अज़हर इनायती

अब ग़म का कोई ग़म ख़ुशी की ख़ुशी मुझे

आख़िर को रास ही गई ज़िंदगी मुझे

अनीस अहमद अनीस

ग़म अज़ीज़ों का हसीनों की जुदाई देखी

देखें दिखलाए अभी गर्दिश-ए-दौराँ क्या क्या

अख़्तर शीरानी

गया याद उन्हें अपने किसी ग़म का हिसाब

हँसने वालों ने मिरे अश्क जो गिन के देखे

नज़ीर बाक़री

दिन छुपा और ग़म के साए ढले

आरज़ू के नए चराग़ जले

क़ाबिल अजमेरी
बोलिए