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बेस्ट मग़फ़िरत शायरी

ये लाश-ए-बे-कफ़न 'असद'-ए-ख़स्ता-जाँ की है

हक़ मग़फ़िरत करे अजब आज़ाद मर्द था

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में मौत की सख़्त सच्चाई दिखाई गई है: इंसान इतना अकेला रह जाता है कि कफ़न भी नहीं। फिर भी वक्ता दुआ करता है और बताता है कि मरने वाला “स्वतंत्र पुरुष” था—अंदर से आज़ाद, अपने उसूलों पर चलने वाला। बेबसी और गरिमा साथ-साथ आती हैं, जिससे शेर में करुणा और आत्मसम्मान दोनों का असर पैदा होता है।

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में मौत की सख़्त सच्चाई दिखाई गई है: इंसान इतना अकेला रह जाता है कि कफ़न भी नहीं। फिर भी वक्ता दुआ करता है और बताता है कि मरने वाला “स्वतंत्र पुरुष” था—अंदर से आज़ाद, अपने उसूलों पर चलने वाला। बेबसी और गरिमा साथ-साथ आती हैं, जिससे शेर में करुणा और आत्मसम्मान दोनों का असर पैदा होता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

कहते हैं आज 'ज़ौक़' जहाँ से गुज़र गया

क्या ख़ूब आदमी था ख़ुदा मग़्फ़िरत करे

Interpretation: Rekhta AI

कवि अपनी ही मृत्यु की कल्पना करते हुए बताता है कि उसके जाने के बाद लोग कैसे उसे याद करेंगे। यह शेर दर्शाता है कि अक्सर इंसान की अच्छाई की कद्र और उसके लिए दुआएं उसके मरने के बाद ही की जाती हैं।

Interpretation: Rekhta AI

कवि अपनी ही मृत्यु की कल्पना करते हुए बताता है कि उसके जाने के बाद लोग कैसे उसे याद करेंगे। यह शेर दर्शाता है कि अक्सर इंसान की अच्छाई की कद्र और उसके लिए दुआएं उसके मरने के बाद ही की जाती हैं।

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

अब ख़ुदा मग़फ़िरत करे उस की

'मीर' मरहूम था अजब कोई

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

मग़फ़िरत की नज़र आती है बस इतनी सूरत

हम गुनाहों से पशेमान रहा करते हैं

मुज़फ़्फ़र अली असीर

हाँ ख़ुदा मग़्फ़िरत करे उस को

सब्र मरहूम था अजब कोई

Interpretation: Rekhta AI

कवि ने ‘धैर्य’ को इंसान की तरह मानकर उसे ‘मरहूम’ कहा है, यानी धैर्य के मर जाने का शोक। पहली पंक्ति की दुआ असल में अपने खोए हुए सहने की ताक़त के लिए है। दुख या प्रेम की चोट ने धैर्य खत्म कर दिया, इसलिए भीतर की यह कमी भी किसी मौत जैसी लगती है। भाव केंद्र में बेबसी और गहरी उदासी है।

Interpretation: Rekhta AI

कवि ने ‘धैर्य’ को इंसान की तरह मानकर उसे ‘मरहूम’ कहा है, यानी धैर्य के मर जाने का शोक। पहली पंक्ति की दुआ असल में अपने खोए हुए सहने की ताक़त के लिए है। दुख या प्रेम की चोट ने धैर्य खत्म कर दिया, इसलिए भीतर की यह कमी भी किसी मौत जैसी लगती है। भाव केंद्र में बेबसी और गहरी उदासी है।

मीर तक़ी मीर

पा लिया अहल-ए-जुनूँ ने फिर शहादत का मक़ाम

अक़्ल वाले मग़्फ़िरत की ही दुआ माँगा किए

मशकूर ममनून क़न्नौजी

मौला से मग़्फ़िरत के अलावा दुआ में 'शाद'

कुछ और माँगने की जसारत कभी की

शमशाद शाद

तबाही तक तो पहुँचे ब-फ़ैज़-ए-मग़्फ़िरत वाइ'ज़

ख़ुदारा अब तो मीर-ए-कारवाँ का ज़िक्र करने दो

सय्यद अंजुमन जाफ़री

सुनते हैं एक 'फ़ैज़' ग़रीब-उद-दयार था

हक़ मग़्फ़िरत करे कि क़ज़ा हो गया वो शख़्स

फैज़ तबस्सुम तोंसवी

समझता हूँ वसीला मग़फ़िरत का शर्म-ए-इस्याँ को

कि अश्कों से मिरे धुल जाएगा दामान-ए-तर मेरा

मोहम्मद यूसुफ़ रासिख़

हमें वाइ'ज़ डराता क्यूँ है दोज़ख़ के अज़ाबों से

मआसी गो हमारे बेश हों कुछ मग़फ़िरत कम है

टेक चंद बहार
बोलिए