अमीर क़ज़लबाश के शेर
उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़
हमें यक़ीं था हमारा क़ुसूर निकलेगा
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उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़
हमें यक़ीं था हमारा क़ुसूर निकलेगा
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मिरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा
इसी सियाह समुंदर से नूर निकलेगा
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मिरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा
इसी सियाह समुंदर से नूर निकलेगा
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लोग जिस हाल में मरने की दुआ करते हैं
मैं ने उस हाल में जीने की क़सम खाई है
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मैं ने उस हाल में जीने की क़सम खाई है
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तुम राह में चुप-चाप खड़े हो तो गए हो
किस किस को बताओगे कि घर क्यूँ नहीं जाते
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तुम राह में चुप-चाप खड़े हो तो गए हो
किस किस को बताओगे कि घर क्यूँ नहीं जाते
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इक परिंदा अभी उड़ान में है
तीर हर शख़्स की कमान में है
इक परिंदा अभी उड़ान में है
तीर हर शख़्स की कमान में है
यकुम जनवरी है नया साल है
दिसम्बर में पूछूँगा क्या हाल है
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टैग : नया साल
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यकुम जनवरी है नया साल है
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उसे बेचैन कर जाऊँगा मैं भी
ख़मोशी से गुज़र जाऊँगा मैं भी
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टैग : ख़ामोशी
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आज की रात भी गुज़री है मिरी कल की तरह
हाथ आए न सितारे तिरे आँचल की तरह
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वक़्त के साथ बदलना तो बहुत आसाँ था
मुझ से हर वक़्त मुख़ातिब रही ग़ैरत मेरी
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टैग : ख़ुद्दारी
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हर क़दम पे नाकामी हर क़दम पे महरूमी
ग़ालिबन कोई दुश्मन दोस्तों में शामिल है
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सुना है अब भी मिरे हाथ की लकीरों में
नजूमियों को मुक़द्दर दिखाई देता है
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टैग : क़िस्मत
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मिरे पड़ोस में ऐसे भी लोग बसते हैं
जो मुझ में ढूँड रहे हैं बुराइयाँ अपनी
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मुझ से बच बच के चली है दुनिया
मेरे नज़दीक ख़ुदा हो जैसे
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ज़िंदगी और हैं कितने तिरे चेहरे ये बता
तुझ से इक उम्र की हालाँकि शनासाई है
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टैग : ज़िंदगी
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आइने से नज़र चुराते हैं
जब से अपना जवाब देखा है
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यार क्या ज़िंदगी है सूरज की
सुब्ह से शाम तक जला करना
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क्या गुज़रती है मिरे बाद उस पर
आज मैं उस से बिछड़ कर देखूँ
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मैं ने क्यूँ तर्क-ए-तअल्लुक़ की जसारत की है
तुम अगर ग़ौर करोगे तो पशीमाँ होगे
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सुकूत-ए-शब में दर-ए-दिल पे एक दस्तक थी
बिखर गई तिरी यादों की कहकशाँ मुझ से
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मिरे घर में तो कोई भी नहीं है
ख़ुदा जाने मैं किस से डर रहा हूँ
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टैग : तन्हाई
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क़त्ल हो तो मेरा सा मौत हो तो मेरी सी
मेरे सोगवारों में आज मेरा क़ातिल है
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टैग : क़ातिल
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सुब्ह तक मैं सोचता हूँ शाम से
जी रहा है कौन मेरे नाम से
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मैं क्या जानूँ घरों का हाल क्या है
मैं सारी ज़िंदगी बाहर रहा हूँ
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टैग : हिजरत
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न जाने कैसा मसीहा था चाहता क्या था
तमाम शहर को बीमार देख कर ख़ुश था
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न जाने कैसा मसीहा था चाहता क्या था
तमाम शहर को बीमार देख कर ख़ुश था
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इतना बेदारियों से काम न लो
दोस्तो ख़्वाब भी ज़रूरी है
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टैग : ख़्वाब
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दोस्तो ख़्वाब भी ज़रूरी है
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