क़ातिल शायरी

ख़ुदा के वास्ते इस को टोको

यही इक शहर में क़ातिल रहा है

मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ

ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है बढ़ता है तो मिट जाता है

ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा

साहिर लुधियानवी

की मिरे क़त्ल के बाद उस ने जफ़ा से तौबा

हाए उस ज़ूद-पशीमाँ का पशीमाँ होना

After she had slain me then from torture she forswore

Alas! the one now quickly shamed was not so before

मिर्ज़ा ग़ालिब

जब लगें ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाए

है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाए

जाँ निसार अख़्तर

क़ातिल ने किस सफ़ाई से धोई है आस्तीं

उस को ख़बर नहीं कि लहू बोलता भी है

इक़बाल अज़ीम

मेरे होने में किसी तौर से शामिल हो जाओ

तुम मसीहा नहीं होते हो तो क़ातिल हो जाओ

इरफ़ान सिद्दीक़ी

क़त्ल हो तो मेरा सा मौत हो तो मेरी सी

मेरे सोगवारों में आज मेरा क़ातिल है

Today amongst my mourners, my murderer too grieves

A death, a murder as was mine, all lovers should attain

अमीर क़ज़लबाश

यूँ क़ातिल को जब यक़ीं आया

हम ने दिल खोल कर दिखाई चोट

फ़ानी बदायुनी

ये सच है चंद लम्हों के लिए बिस्मिल तड़पता है

फिर इस के बअ'द सारी ज़िंदगी क़ातिल तड़पता है

ख़ुशबीर सिंह शाद

शहर के आईन में ये मद भी लिक्खी जाएगी

ज़िंदा रहना है तो क़ातिल की सिफ़ारिश चाहिए

हकीम मंज़ूर

कौन पुरसाँ है हाल-ए-बिस्मिल का

ख़ल्क़ मुँह देखती है क़ातिल का

शैख़ अली बख़्श बीमार