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हसन बरेलवी

1859 - 1908 | बरेली, भारत

मौलाना अहमद रज़ा ख़ान के भाई, दाग़ देहलवी के शिष्य

मौलाना अहमद रज़ा ख़ान के भाई, दाग़ देहलवी के शिष्य

हसन बरेलवी के शेर

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जान अगर हो जान तो क्यूँ-कर हो तुझ पर निसार

दिल अगर हो दिल तिरी सूरत पे शैदा क्यूँ हो

दिल को जानाँ से 'हसन' समझा-बुझा के लाए थे

दिल हमें समझा-बुझा कर सू-ए-जानाँ ले चला

इश्क़ में बे-ताबियाँ होती हैं लेकिन 'हसन'

जिस क़दर बेचैन तुम हो उस क़दर कोई हो

वस्ल में मुँह छुपाने वाले

ये भी कोई वक़्त है हया का

किस के चेहरे से उठ गया पर्दा

झिलमिलाए चराग़ महफ़िल के

उल्फ़त हो किसी की मोहब्बत हो किसी की

पहलू में दिल हो ये हालत हो किसी की

देख आओ मरीज़-ए-फ़ुर्क़त को

रस्म-ए-दुनिया भी है सवाब भी है

आप की ज़िद ने मुझे और पिलाई हज़रत

शैख़-जी इतनी नसीहत भी बुरी होती है

बोले वो बोसा-हा-ए-पैहम पर

अरे कम-बख़्त कुछ हिसाब भी है

हमारे घर से जाना मुस्कुरा कर फिर ये फ़रमाना

तुम्हें मेरी क़सम देखो मिरी रफ़्तार कैसी है

चोट जब दिल पर लगे फ़रियाद पैदा क्यूँ हो

सितम-आरा जो ऐसा हो तो ऐसा क्यूँ हो

क्या कहूँ क्या है मेरे दिल की ख़ुशी

तुम चले जाओगे ख़फ़ा हो कर

अब्र है गुलज़ार है मय है ख़ुशी का दौर है

आज तो डूबे हुए दिल को उछलने दीजिए

गुलशन-ए-ख़ुल्द की क्या बात है क्या कहना है

पर हमें तेरे ही कूचे में पड़ा रहना है

एक कह कर जिस ने सुननी हो हज़ारों बातें

वो कहे उन से मुझे आप से कुछ कहना है

जो ख़ास जल्वे थे उश्शाक़ की नज़र के लिए

वो आम कर दिए तुम ने जहान भर के लिए

शीशा उठा कर ताक़ से हम ने

ताक़ पे रख दी साक़ी तौबा

पूछते जाते हैं ये हम सब से

मजलिस-ए-वाज़ में शराब भी है

आई क्या जी में तेग़-ए-क़ातिल के

कि जुदा हो गई गले मिल के

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