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जमीलुद्दीन आली

1925 - 2015 | कराची, पाकिस्तान

अपने दोहों के लिए मशहूर।

अपने दोहों के लिए मशहूर।

उर्दू वाले हिन्दी वाले दोनों हँसी उड़ाएँ

हम दिल वाले अपनी भाषा किस किस को सिखलाएँ

हर इक बात में डाले है हिन्दू मुस्लिम की बात

ये ना जाने अल्हड़ गोरी प्रेम है ख़ुद इक ज़ात

'आली' अब के कठिन पड़ा दीवाली का त्यौहार

हम तो गए थे छैला बन कर भय्या कह गई नार

दरिया दरिया घूमे माँझी पेट की आग बुझाने

पेट की आग में जलने वाला किस किस को पहचाने

साजन हम से मिले भी लेकिन ऐसे मिले कि हाए

जैसे सूखे खेत से बादल बिन बरसे उड़ जाए

नींद को रोकना मुश्किल था पर जाग के काटी रात

सोते में जाते वो तो नीची होती बात

बाबू-गीरी करते हो गए 'आली' को दो साल

मुरझाया वो फूल सा चेहरा भूरे पड़ गए बाल

कच्चे महल की रानी आई रात हमारे पास

होंट पे लाखा गाल पे लाली आँखें बहुत उदास

बुर्क़ा-पोश पठानी जिस की लाज में सौ सौ रूप

खुल के देखी फिर भी देखी हम ने छाँव में धूप

धीरे धीरे कमर की सख़्ती कुर्सी ने ली चाट

चुपके चुपके मन की शक्ति अफ़सर ने दी काट

ना कोई उस से भाग सके और ना कोई उस को पाए

आप ही घाव लगाए समय और आप ही भरने आए

पहले कभी नहीं गुज़री थी जो गुज़री इस शाम

सब कुछ भूल चुके थे लेकिन याद रहा इक नाम

इक गहरा सुनसान समुंदर जिस के लाख बहाओ

तड़प रही है उस की इक इक मौज पे जीवन-नाव

शहर में चर्चा आम हुआ है साथ थे हम इक शाम

मुझे भी जानें तुझे भी जानें लोग करें बद-नाम

रोज़ इक महफ़िल और हर महफ़िल नारियों से भरपूर

पास भी हों तो जान के बैठें 'आली' सब से दूर

प्यार करे और सिसकी भरे फिर सिसकी भर कर प्यार

क्या जाने कब इक इक कर के भाग गए सब यार

रोटी जिस की भीनी ख़ुश्बू है हज़ारों राग

नहीं मिले तो तन जल जाए मिले तो जीवन आग

एक बिदेसी नार की मोहनी सूरत हम को भाई

और वो पहली नार थी भय्या जो निकली हरजाई

इस दीवानी दौड़ में बच बच जाता था हर बार

इक दोहा सो इसे भी ले जा तू ही ख़ुश रह यार

दोहे कबित कह कह कर 'आली' मन की आग बुझाए

मन की आग बुझी किसी से उसे ये कौन बताए

'सूर' 'कबीर' 'बहारी' 'मीरा' 'रहिमन' 'तुलसी-दास'

सब की सेवा की पर 'आली' गई मन की प्यास