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मुबारक अज़ीमाबादी

1849 | पटना, भारत

बिहार के प्रमुख उत्तर-क्लासिकी शायर

बिहार के प्रमुख उत्तर-क्लासिकी शायर

जो निगाह-ए-नाज़ का बिस्मिल नहीं

दिल नहीं वो दिल नहीं वो दिल नहीं

रहने दे अपनी बंदगी ज़ाहिद

बे-मोहब्बत ख़ुदा नहीं मिलता

तेरी बख़्शिश के भरोसे पे ख़ताएँ की हैं

तेरी रहमत के सहारे ने गुनहगार किया

मुझ को मालूम है अंजाम-ए-मोहब्बत क्या है

एक दिन मौत की उम्मीद पे जीना होगा

फूल क्या डालोगे तुर्बत पर मिरी

ख़ाक भी तुम से डाली जाएगी

कब वो आएँगे इलाही मिरे मेहमाँ हो कर

कौन दिन कौन बरस कौन महीना होगा

दिन भी है रात भी है सुब्ह भी है शाम भी है

इतने वक़्तों में कोई वक़्त-ए-मुलाक़ात भी है

अपनी सी करो तुम भी अपनी सी करें हम भी

कुछ तुम ने भी ठानी है कुछ हम ने भी ठानी है

तिरी अदा की क़सम है तिरी अदा के सिवा

पसंद और किसी की हमें अदा हुई

आप का इख़्तियार है सब पर

आप पर इख़्तियार किस का है

इक तिरी बात कि जिस बात की तरदीद मुहाल

इक मिरा ख़्वाब कि जिस ख़्वाब की ताबीर नहीं

जो दिल-नशीं हो किसी के तो इस का क्या कहना

जगह नसीब से मिलती है दिल के गोशों में

किसी ने बर्छियाँ मारीं किसी ने तीर मारे हैं

ख़ुदा रक्खे इन्हें ये सब करम-फ़रमा हमारे हैं

समझाएँ किस तरह दिल-ए-ना-कर्दा-कार को

ये दोस्ती समझता है दुश्मन के प्यार को

शिकस्त-ए-तौबा की तम्हीद है तिरी तौबा

ज़बाँ पे तौबा 'मुबारक' निगाह साग़र पर

मोहब्बत में वफ़ा की हद जफ़ा की इंतिहा कैसी

'मुबारक' फिर कहना ये सितम कोई सहे कब तक

ये ग़म-कदा है इस में 'मुबारक' ख़ुशी कहाँ

ग़म को ख़ुशी बना कोई पहलू निकाल के

मेहरबानी चारासाज़ों की बढ़ी

जब बढ़ा दरमाँ तो बीमारी बढ़ी

ले चला फिर मुझे दिल यार-ए-दिल-आज़ार के पास

अब के छोड़ आऊँगा ज़ालिम को सितमगार के पास

ख़ैर साक़ी की सलामत मय-कदा

जिस क़दर पी उतनी हुश्यारी बढ़ी