ग़म शायरी

ग़म हमारी ज़िंदगी का एक अनिवार्य रंग है और इस को कई तरह से स्थायित्व हासिल है । हालाँकि ख़ुशी भी हमारी ज़िंदगी का ही एक रंग है लेकिन इस को उस तरह से स्थायित्व हासिल नहीं है । उर्दू शायरी में ग़म-ए-दौराँ, ग़म-ए-जानाँ, ग़म-ए-इश्क़, गम-ए-रोज़गार जैसे शब्द-संरचना या मिश्रित शब्द-संरचना का प्रयोग अधिक होता है । उर्दू शायरी का ये रूप वास्तव में ज़िंदगी का एक दुखद वर्णन है । विरह या जुदाई सिर्फ़ आशिक़ का अपने माशूक़ से भौतिक-सुख या शारीरिक स्पर्श का न होना ही नहीं बल्कि इंसान की बद-नसीबी / महरूमी का रूपक है हमारा यह चयन ग़म और दुख के व्यापक क्षेत्र की एक सैर है।


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आशोब-ए-इज़्तिराब में खटका जो है तो ये


ग़म तेरा मिल जाए ग़म-ए-रोज़गार में

अब तो ख़ुशी का ग़म है ग़म की ख़ुशी मुझे


बे-हिस बना चुकी है बहुत ज़िंदगी मुझे

अगर मौजें डुबो देतीं तो कुछ तस्कीन हो जाती


किनारों ने डुबोया है मुझे इस बात का ग़म है

ग़म-ए-ज़िंदगी हो नाराज़


मुझ को आदत है मुस्कुराने की

ऐश ही ऐश है सब ग़म है


ज़िंदगी इक हसीन संगम है

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे


तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे

एक वो हैं कि जिन्हें अपनी ख़ुशी ले डूबी


एक हम हैं कि जिन्हें ग़म ने उभरने दिया

इक इक क़दम पे रक्खी है यूँ ज़िंदगी की लाज


ग़म का भी एहतिराम किया है ख़ुशी के साथ

इक इश्क़ का ग़म आफ़त और उस पे ये दिल आफ़त


या ग़म दिया होता या दिल दिया होता

इलाही एक ग़म-ए-रोज़गार क्या कम था


कि इश्क़ भेज दिया जान-ए-मुब्तला के लिए

इश्क़ ने जिस दिल पे क़ब्ज़ा कर लिया


फिर कहाँ उस में नशात ग़म रहे

कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब


आज तुम याद बे-हिसाब आए

कौन किसी का ग़म खाता है


कहने को ग़म-ख़्वार है दुनिया

ख़ुदा की देन है जिस को नसीब हो जाए


हर एक दिल को ग़म-ए-जावेदाँ नहीं मिलता

किस तरह अपनी मोहब्बत की मैं तकमील करूँ


ग़म-ए-हस्ती भी तो शामिल है ग़म-ए-यार के साथ

कोई इक ज़ाइक़ा नहीं मिलता


ग़म में शामिल ख़ुशी सी रहती है

क्या कहूँ किस तरह से जीता हूँ


ग़म को खाता हूँ आँसू पीता हूँ

क़ैद-ए-हयात बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं


मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ

क़िस्सा-ए-मजनूँ पसंद-ए-ख़ातिर जानाना है


वर्ना ख़्वाब-आवर तो अपने ग़म का भी अफ़्साना है

उल्फ़त का है मज़ा कि 'असर' ग़म भी साथ हों


तारीकियाँ भी साथ रहें रौशनी के साथ

उन का ग़म उन का तसव्वुर उन के शिकवे अब कहाँ


अब तो ये बातें भी दिल हो गईं आई गई

उन का ग़म उन का तसव्वुर उन की याद


कट रही है ज़िंदगी आराम से

उसे भी जाते हुए तुम ने मुझ से छीन लिया


तुम्हारा ग़म तो मिरी आरज़ू का ज़ेवर था

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