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ग़ज़ल
तिश्ना-ए-ख़ूँ है अपना कितना 'मीर' भी नादाँ तल्ख़ी-कश
दम-दार आब-ए-तेग़ को उस के आब-ए-गवारा जाने है
मीर तक़ी मीर
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
नहीं मालूम 'ज़रयून' अब तुम्हारी उम्र क्या होगी
वो किन ख़्वाबों से जाने आश्ना ना-आश्ना होगी
जौन एलिया
नज़्म
ए'तिराफ़
अब मिरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो
मैं ने माना कि तुम इक पैकर-ए-रानाई हो
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
शाम के रंगों में रख कर साफ़ पानी का गिलास
आब-ए-सादा को हरीफ़-ए-रंग-ए-बादा कर लिया
मुनीर नियाज़ी
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ग़ज़ल
बहादुर शाह ज़फ़र
नज़्म
मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा
आब-ए-रवान-ए-कबीर तेरे किनारे कोई
देख रहा है किसी और ज़माने का ख़्वाब
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
थी नज़र हैराँ कि ये दरिया है या तस्वीर-ए-आब
जैसे गहवारे में सो जाता है तिफ़्ल-ए-शीर-ख़्वार
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
गिराँ-बहा है तो हिफ़्ज़-ए-ख़ुदी से है वर्ना
गुहर में आब-ए-गुहर के सिवा कुछ और नहीं














