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तंज़-ओ-मिज़ाह पर ग़ज़लें

तंज़-ओ-मिज़ाह की शायरी

बयक-वक़्त कई डाईमेंशन रखती है, इस में हंसने हंसाने और ज़िंदगी की तलख़ियों को क़हक़हे में उड़ाने की सकत भी होती है और मिज़ाह के पहलू में ज़िंदगी की ना-हमवारियों और इंसानों के ग़लत रवय्यों पर तंज और मिज़ाह के पैराए में एक तख़लीक़-कार वो सब कह जाता है जिस के इज़हार की आम ज़िंदगी में तवक़्क़ो भी नहीं की जा सकती। ये शायरी पढ़िए और ज़िंदगी के उन दिल-चस्प इलाक़ों की सैर कीजिए।

लात उठा हाथ उठा जूता उठा माई डीयर

वहिद अंसारी बुरहानपुरी

नदी नाले में कूद जाऊँगा

वहिद अंसारी बुरहानपुरी

नज़र नज़र से मिलाएँगे जान-ए-मन हम भी

वहिद अंसारी बुरहानपुरी

हाल से बेहाल जैसे लोग हैं

बेतकल्लुफ़ शाजापुरी

अक़्ल की घास चर गए मामूँ

वहिद अंसारी बुरहानपुरी

रक़्स में आज चारपाई है

बेतकल्लुफ़ शाजापुरी

प्यार की हम ने पकाई खीर आधी रह गई

वहिद अंसारी बुरहानपुरी

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