Ada Jafarey's Photo'

अदा जाफ़री

1924 - 2015 | कराची, पाकिस्तान

महत्वपूर्ण पाकिस्तानी शायरा, अपनी नर्म और सुगढ़ शायरी के लिए विख्यात।

महत्वपूर्ण पाकिस्तानी शायरा, अपनी नर्म और सुगढ़ शायरी के लिए विख्यात।

3.95K
Favorite

श्रेणीबद्ध करें

मैं आँधियों के पास तलाश-ए-सबा में हूँ

तुम मुझ से पूछते हो मिरा हौसला है क्या

होंटों पे कभी उन के मिरा नाम ही आए

आए तो सही बर-सर-ए-इल्ज़ाम ही आए

हाथ काँटों से कर लिए ज़ख़्मी

फूल बालों में इक सजाने को

अगर सच इतना ज़ालिम है तो हम से झूट ही बोलो

हमें आता है पतझड़ के दिनों गुल-बार हो जाना

हमारे शहर के लोगों का अब अहवाल इतना है

कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

जिस की बातों के फ़साने लिक्खे

उस ने तो कुछ कहा था शायद

जो चराग़ सारे बुझा चुके उन्हें इंतिज़ार कहाँ रहा

ये सुकूँ का दौर-ए-शदीद है कोई बे-क़रार कहाँ रहा

देख कि मेरे आँसुओं में

ये किस का जमाल गया है

एक आईना रू-ब-रू है अभी

उस की ख़ुश्बू से गुफ़्तुगू है अभी

जिस की जानिब 'अदा' नज़र उठी

हाल उस का भी मेरे हाल सा था

वर्ना इंसान मर गया होता

कोई बे-नाम जुस्तुजू है अभी

गुल पर क्या कुछ बीत गई है

अलबेला झोंका क्या जाने

बड़े ताबाँ बड़े रौशन सितारे टूट जाते हैं

सहर की राह तकना ता सहर आसाँ नहीं होता

दिल के वीराने में घूमे तो भटक जाओगे

रौनक़-ए-कूचा-ओ-बाज़ार से आगे बढ़ो

लोग बे-मेहर होते होंगे

वहम सा दिल को हुआ था शायद

बोलते हैं दिलों के सन्नाटे

शोर सा ये जो चार-सू है अभी

रीत भी अपनी रुत भी अपनी

दिल रस्म-ए-दुनिया क्या जाने

बस एक बार मनाया था जश्न-ए-महरूमी

फिर उस के बाद कोई इब्तिला नहीं आई

कुछ इतनी रौशनी में थे चेहरों के आइने

दिल उस को ढूँढता था जिसे जानता था

हज़ार कोस निगाहों से दिल की मंज़िल तक

कोई क़रीब से देखे तो हम को पहचाने

ख़ामुशी से हुई फ़ुग़ाँ से हुई

इब्तिदा रंज की कहाँ से हुई

कोई ताइर इधर नहीं आता

कैसी तक़्सीर इस मकाँ से हुई

हुआ यूँ कि फिर मुझे ज़िंदगी ने बसर किया

कोई दिन थे जब मुझे हर नज़ारा हसीं मिला

कटता कहाँ तवील था रातों का सिलसिला

सूरज मिरी निगाह की सच्चाइयों में था

कोई बात ख़्वाब-ओ-ख़याल की जो करो तो वक़्त कटेगा अब

हमें मौसमों के मिज़ाज पर कोई ए'तिबार कहाँ रहा

जो दिल में थी निगाह सी निगाह में किरन सी थी

वो दास्ताँ उलझ गई वज़ाहतों के दरमियाँ

अभी सहीफ़ा-ए-जाँ पर रक़म भी क्या होगा

अभी तो याद भी बे-साख़्ता नहीं आई

बहलावा समझौता जुदाई सी जुदाई है

'अदा' सोचो तो ख़ुशबू का सफ़र आसाँ नहीं होता

काँटा सा जो चुभा था वो लौ दे गया है क्या

घुलता हुआ लहू में ये ख़ुर्शीद सा है क्या

वो कैसी आस थी अदा जो कू-ब-कू लिए फिरी

वो कुछ तो था जो दिल को आज तक कभू मिला नहीं

सब से बड़ा फ़रेब है ख़ुद ज़िंदगी 'अदा'

इस हीला-जू के साथ हैं हम भी बहाना-साज़

बुझी हुई हैं निगाहें ग़ुबार है कि धुआँ

वो रास्ता है कि अपना भी नक़्श-ए-पा मिले

मता-ए-दर्द परखना तो बस की बात नहीं

जो तुझ को देख के आए वो हम को पहचाने

ख़ज़ीने जाँ के लुटाने वाले दिलों में बसने की आस ले कर

सुना है कुछ लोग ऐसे गुज़रे जो घर से आए घर गए हैं

वो तिश्नगी थी कि शबनम को होंट तरसे हैं

वो आब हूँ कि मुक़य्यद गुहर गुहर में रहूँ

तू ने मिज़्गाँ उठा के देखा भी

शहर ख़ाली था मकीनों से

किन मंज़िलों लुटे हैं मोहब्बत के क़ाफ़िले

इंसाँ ज़मीं पे आज ग़रीब-उल-वतन सा है

मिज़ाज-ओ-मर्तबा-ए-चश्म-ए-नम को पहचाने

जो तुझ को देख के आए वो हम को पहचाने

ख़लिश-ए-तीर-ए-बे-पनाह गई

लीजिए उन से रस्म-ओ-राह गई

बे-नवा हैं कि तुझे सौ-ओ-नवा भी दी है

जिस ने दिल तोड़ दिए उस की दुआ भी दी है