Saleem Kausar's Photo'

पाकिस्तान के चर्चित शायर। अपनी ग़ज़ल ' मैं ख़याल हूँ किसी और का ' के लिए मशहूर।

पाकिस्तान के चर्चित शायर। अपनी ग़ज़ल ' मैं ख़याल हूँ किसी और का ' के लिए मशहूर।

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क़ुर्बतें होते हुए भी फ़ासलों में क़ैद हैं

कितनी आज़ादी से हम अपनी हदों में क़ैद हैं

कहानी लिखते हुए दास्ताँ सुनाते हुए

वो सो गया है मुझे ख़्वाब से जगाते हुए

वक़्त रुक रुक के जिन्हें देखता रहता है 'सलीम'

ये कभी वक़्त की रफ़्तार हुआ करते थे

दुनिया अच्छी भी नहीं लगती हम ऐसों को 'सलीम'

और दुनिया से किनारा भी नहीं हो सकता

हम ने तो ख़ुद से इंतिक़ाम लिया

तुम ने क्या सोच कर मोहब्बत की

मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है

सर-ए-आईना मिरा अक्स है पस-ए-आईना कोई और है

I am someone else's thought, someone else brings me to mind

my image in the mirror wrought, someone else is there behind

और इस से पहले कि साबित हो जुर्म-ए-ख़ामोशी

हम अपनी राय का इज़हार करना चाहते हैं

मुझे सँभालने में इतनी एहतियात कर

बिखर जाऊँ कहीं मैं तिरी हिफ़ाज़त में

तुम ने सच बोलने की जुरअत की

ये भी तौहीन है अदालत की

आईना ख़ुद भी सँवरता था हमारी ख़ातिर

हम तिरे वास्ते तय्यार हुआ करते थे

तमाम उम्र सितारे तलाश करता फिरा

पलट के देखा तो महताब मेरे सामने था

तुझे दुश्मनों की ख़बर थी मुझे दोस्तों का पता नहीं

तिरी दास्ताँ कोई और थी मिरा वाक़िआ कोई और है

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पुकारते हैं उन्हें साहिलों के सन्नाटे

जो लोग डूब गए कश्तियाँ बनाते हुए

कुछ इस तरह से वो शामिल हुआ कहानी में

कि इस के बाद जो किरदार था फ़साना हुआ

कभी इश्क़ करो और फिर देखो इस आग में जलते रहने से

कभी दिल पर आँच नहीं आती कभी रंग ख़राब नहीं होता

मिरे चारागर तिरे बस में नहीं मोआमला

सूरत-ए-हाल के लिए वाक़िफ़-ए-हाल चाहिए

'सलीम' अब तक किसी को बद-दुआ दी तो नहीं लेकिन

हमेशा ख़ुश रहे जिस ने हमारा दिल दुखाया है

मैं किसी के दस्त-ए-तलब में हूँ तो किसी के हर्फ़-ए-दुआ में हूँ

मैं नसीब हूँ किसी और का मुझे माँगता कोई और है

I am in someone's outstretched hand, and in someone's prayer prayer I be

I am someone's destiny but someone else does ask for me

क़दमों में साए की तरह रौंदे गए हैं हम

हम से ज़ियादा तेरा तलबगार कौन है

वो जिन के नक़्श-ए-क़दम देखने में आते हैं

अब ऐसे लोग तो कम देखने में आते हैं

तुम तो कहते थे कि सब क़ैदी रिहाई पा गए

फिर पस-ए-दीवार-ए-ज़िंदाँ रात-भर रोता है कौन

मोहब्बत अपने लिए जिन को मुंतख़ब कर ले

वो लोग मर के भी मरते नहीं मोहब्बत में

साँस लेने से भी भरता नहीं सीने का ख़ला

जाने क्या शय है जो बे-दख़्ल हुई है मुझ में

ख़ामोश सही मरकज़ी किरदार तो हम थे

फिर कैसे भला तेरी कहानी से निकलते

अब जो लहर है पल भर बाद नहीं होगी यानी

इक दरिया में दूसरी बार उतरा नहीं जा सकता

रात को रात ही इस बार कहा है हम ने

हम ने इस बार भी तौहीन-ए-अदालत नहीं की

याद का ज़ख़्म भी हम तुझ को नहीं दे सकते

देख किस आलम-ए-ग़ुर्बत में मिले हैं तुझ से

ये लोग इश्क़ में सच्चे नहीं हैं वर्ना हिज्र

इब्तिदा कहीं इंतिहा में आता है

दस्त-ए-दुआ को कासा-ए-साइल समझते हो

तुम दोस्त हो तो क्यूँ नहीं मुश्किल समझते हो

देखते कुछ हैं दिखाते हमें कुछ हैं कि यहाँ

कोई रिश्ता ही नहीं ख़्वाब का ताबीर के साथ

अभी हैरत ज़ियादा और उजाला कम रहेगा

ग़ज़ल में अब के भी तेरा हवाला कम रहेगा

ज़ोरों पे 'सलीम' अब के है नफ़रत का बहाव

जो बच के निकल आएगा तैराक वही है

अहल-ए-ख़िरद को आज भी अपने यक़ीन के लिए

जिस की मिसाल ही नहीं उस की मिसाल चाहिए

अजनबी हैरान मत होना कि दर खुलता नहीं

जो यहाँ आबाद हैं उन पर भी घर खुलता नहीं

मैं जानता हूँ मकीनों की ख़ामुशी का सबब

मकाँ से पहले दर-ओ-बाम से मिला हूँ मैं

एक तरफ़ तिरे हुस्न की हैरत एक तरफ़ दुनिया

और दुनिया में देर तलक ठहरा नहीं जा सकता

साए गली में जागते रहते हैं रात भर

तन्हाइयों की ओट से झाँका कर मुझे

तू ने देखा नहीं इक शख़्स के जाने से 'सलीम'

इस भरे शहर की जो शक्ल हुई है मुझ में

बहुत दिनों में कहीं हिज्र-ए-माह-ओ-साल के बाद

रुका हुआ है ज़माना तिरे विसाल के बाद

मिरी रौशनी तिरे ख़द्द-ओ-ख़ाल से मुख़्तलिफ़ तो नहीं मगर

तू क़रीब तुझे देख लूँ तू वही है या कोई और है

tho my sight unconversant with your features may not be

if or not you are the same come close and let me see,

इंतिज़ार और दस्तकों के दरमियाँ कटती है उम्र

इतनी आसानी से तो बाब-ए-हुनर खुलता नहीं

मैं ने जो लिख दिया वो ख़ुद है गवाही अपनी

जो नहीं लिक्खा अभी उस की बशारत दूँगा

जो मिरी रियाज़त-ए-नीम-शब को 'सलीम' सुब्ह मिल सकी

तो फिर इस के मअ'नी तो ये हुए कि यहाँ ख़ुदा कोई और है

if for my midnight prayers, Saliim, a dawn there shall never be

then it means that in this world there is a God other than thee

भला वो हुस्न किस की दस्तरस में सका है

कि सारी उम्र भी लिक्खें मक़ाला कम रहेगा

जुदाई भी होती ज़िंदगी भी सहल हो जाती

जो हम इक दूसरे से मसअला तब्दील कर लेते

कैसे हंगामा-ए-फ़ुर्सत में मिले हैं तुझ से

हम भरे शहर की ख़ल्वत में मिले हैं तुझ से

क्या अजब कार-ए-तहय्युर है सुपुर्द-ए-नार-ए-इश्क़

घर में जो था बच गया और जो नहीं था जल गया

ये आग लगने से पहले की बाज़-गश्त है जो

बुझाने वालों को अब तक धुआँ बुलाता है