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आशिक़ पर शेर

आशिक़ पर ये शेरी इन्तिख़ाब

आशिक़ के किरदार की रंगा रंग तर्फ़ों को मौज़ू बनाता है। आशिक़ जिन लमहों को जीता है उन की कैफ़ियतें क्या होती हैं, वो दुख, दर्द, बे-चैनी, उम्मीद ओ ना-उम्मीदी किन एहसासात से गुज़ुरता है ये सब इस शेरी इन्तिख़ाब में है। ये शायरी इस लिए भी दिल-चस्प है कि हम सब इस आइने में अपनी अपनी शक्लें देख सकते हैं और अपनी शनाख़्त कर सकते हैं।

चल साथ कि हसरत दिल-ए-मरहूम से निकले

आशिक़ का जनाज़ा है ज़रा धूम से निकले

फ़िदवी लाहौरी
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अनोखी वज़्अ' है सारे ज़माने से निराले हैं

ये आशिक़ कौन सी बस्ती के या-रब रहने वाले हैं

अल्लामा इक़बाल

ये आशिक़ी तिरे बस की नहीं सो रहने दे

कि तेरा काम तो बस ना-सिपास होना है

राहुल झा